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	<title>सेहत &#8211; Fastball Files | Sports News &amp; More</title>
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	<description>Sports News, Lifestyle &#38; Entertainment Articles</description>
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	<title>सेहत &#8211; Fastball Files | Sports News &amp; More</title>
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		<title>भारत में मोटापे के मामले में पुरुषों से आगे निकलीं महिलाएं</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162370/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 May 2026 12:32:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[क्या आपने कभी सोचा है कि बदलती लाइफस्टाइल हमारी सेहत पर कितना गहरा असर डाल रही है? हाल ही में जारी हुई ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6)’ की ताजा रिपोर्ट ने देश के स्वास्थ्य से जुड़ी एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की है। देश के वयस्कों में मोटापा और हाई ब्लड शुगर की बीमारी बहुत &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img width="735" height="365" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/6-30.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>क्या आपने कभी सोचा है कि बदलती लाइफस्टाइल हमारी सेहत पर कितना गहरा असर डाल रही है? हाल ही में जारी हुई ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6)’ की ताजा रिपोर्ट ने देश के स्वास्थ्य से जुड़ी एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश की है।</p>
<p>देश के वयस्कों में मोटापा और हाई ब्लड शुगर की बीमारी बहुत तेजी से फैल रही है, लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस मोटापे की मार पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर कहीं अधिक पड़ रही है, जिससे जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। आइए, आसान शब्दों में समझते हैं कि इस अहम रिपोर्ट में महिलाओं, पुरुषों और बच्चों की सेहत को लेकर क्या खुलासे हुए हैं।</p>
<h3 class="wp-block-heading">महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित</h3>
<p>रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि देश में मोटापा किस कदर तेजी से बढ़ रहा है। साल 2019-21 के दौरान 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग में 24 प्रतिशत महिलाएं मोटापे से जूझ रही थीं, लेकिन 2023-24 आते-आते यह आंकड़ा छलांग लगाकर 30.7 प्रतिशत तक पहुंच गया।</p>
<p>वहीं, इसी आयु वर्ग के पुरुषों की बात करें तो उनमें भी मोटापे का ग्राफ 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत हो गया है। यानी मोटापा हर किसी को घेर रहा है, लेकिन महिलाओं में इसकी रफ्तार कहीं ज्यादा है।</p>
<p><strong>मोटापे के मामले में कौन-सा राज्य कहां खड़ा है?<br /></strong>अगर हम राज्यों के हिसाब से देखें, तो महिलाओं में मोटापे की सबसे डराने वाली स्थिति पुडुचेरी में है।</p>
<p>पुडुचेरी में 46.3% महिलाएं मोटापे का शिकार हैं।<br />इसके बाद चंडीगढ़ (44%), दिल्ली (41.4%) और पंजाब (40.8%) का नंबर आता है।</p>
<p>हालांकि, राहत की बात यह है कि बिहार, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में महिलाओं में मोटापे की दर काफी कम देखी गई है। दूसरी ओर, पुरुषों में मोटापे के मामले में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह सबसे आगे है, जहां लगभग 38% पुरुष मोटापे के शिकार हैं। इसके बाद पंजाब, केरल, तमिलनाडु, दिल्ली और गोवा का स्थान आता है।</p>
<p><strong>हाई ब्लड शुगर ने भी बढ़ाई टेंशन<br /></strong>मोटापे के साथ-साथ हाई ब्लड शुगर भी देश के वयस्कों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन रहा है। 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में हाई ब्लड शुगर होने या उसे कंट्रोल करने के लिए दवा खाने वालों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है:</p>
<p>महिलाओं में यह आंकड़ा 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत हो गया है।<br />पुरुषों में यह आंकड़ा 15.6 प्रतिशत से उछलकर 20.9 प्रतिशत तक पहुंच गया है।</p>
<p><strong>सस्ते और सुरक्षित सैनिटरी प्रोडक्ट्स का दिखा असर<br /></strong>सेहत से जुड़ी इन चिंताओं के बीच कुछ अच्छी खबरें भी हैं। 15 से 24 साल की युवतियों में पीरियड्स के दौरान स्वच्छता के सुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल बढ़ा है। यह आंकड़ा 2019-21 के 77.6% से बढ़कर अब 79.2% हो गया है। यह सुधार ‘राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम’ की मासिक धर्म स्वच्छता योजना और ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना’ के तहत मिलने वाले सस्ते और सुरक्षित उत्पादों का ही नतीजा है।</p>
<p><strong>पारंपरिक तरीकों पर लौट रहा भरोसा<br /></strong>रिपोर्ट में एक बेहद दिलचस्प ट्रेंड यह सामने आया है कि विवाहित महिलाओं के बीच परिवार नियोजन के आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल कम हो रहा है, जबकि पुरानी या पारंपरिक विधियों पर उनका भरोसा बढ़ रहा है।</p>
<p>आधुनिक तरीके: इनका उपयोग करने वाली महिलाओं का अनुपात 56.4 प्रतिशत से गिरकर 52.7 प्रतिशत रह गया है।<br />पारंपरिक तरीके: इसी दौरान, पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल 10.3 प्रतिशत से बढ़कर 16.4 प्रतिशत हो गया है।</p>
<p><strong>बच्चों की सेहत के मोर्चे पर बड़ी कामयाबी<br /></strong>बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय ने काफी उत्साहजनक जानकारी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षित पीने के पानी और बेहतर टीकाकरण की वजह से बच्चों के स्वास्थ्य में शानदार सुधार हुआ है:</p>
<p>डायरिया में कमी: पांच साल से कम उम्र के बच्चों में डायरिया के मामले 0.7 प्रतिशत से घटकर 0.5 प्रतिशत रह गए हैं।<br />टीकाकरण में उछाल: 12 से 23 महीने के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण की दर 83.8% से बढ़कर शानदार 87.1% हो गई है।<br />कुपोषण से लड़ाई: बच्चों में बौनेपन और गंभीर कुपोषण के मामलों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p><strong>ब्रेस्टफीडिंग को लेकर भी बढ़ी जागरूकता<br /></strong>जन्म के पहले घंटे के भीतर नवजात को मां का दूध पिलाने के मामले में भी अच्छी प्रगति हुई है। 3 साल से कम उम्र के जिन बच्चों को जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान कराया गया, उनका प्रतिशत 41.8% से बढ़कर 50.1% हो गया है। इतना ही नहीं, सर्वेक्षण के दौरान यह भी पाया गया कि 6 महीने से कम आयु के 95.6% बच्चों को मां का दूध पिलाया गया, जो कि शिशु पोषण की दिशा में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक कदम है।</p>
</div>
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		<title>सभी नुकसान जानते हुए भी क्यों सिगरेट नहीं छोड़ पाते लोग</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162318/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 May 2026 12:33:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[सिगरेट के हर पैकेट पर कैंसर से सड़े हुए गले या फेफड़ों की डरावनी तस्वीर होती है। हर कोई जानता है कि तंबाकू जानलेवा है, इससे दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और फेफड़े खराब होते हैं। इसके बावजूद दुनिया भर में करोड़ों लोग रोजाना स्मोकिंग करते हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि मौत का खौफ भी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="583" height="307" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/9-1.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>सिगरेट के हर पैकेट पर कैंसर से सड़े हुए गले या फेफड़ों की डरावनी तस्वीर होती है। हर कोई जानता है कि तंबाकू जानलेवा है, इससे दिल की बीमारियां, स्ट्रोक और फेफड़े खराब होते हैं। इसके बावजूद दुनिया भर में करोड़ों लोग रोजाना स्मोकिंग करते हैं।</p>
<p>आखिर ऐसा क्यों है कि मौत का खौफ भी इस लत के सामने छोटा पड़ जाता है? इसके जानलेवा प्रभावों के बारे में पता होने के बाद भी लोग सिगरेट या तंबाकू की आदत को छोड़ नहीं पाते, इसका क्या कारण है? दरअसल, इसके पीछे कमजोर इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि कोई और वजह छिपी है। आइए डॉ. सफलता बाघमर (सीनियर कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से इस बारे में जानते हैं।</p>
<p><strong>निकोटीन की लत<br /></strong>तंबाकू में पाया जाने वाला निकोटीन दुनिया के सबसे खतरनाक और एडिक्टिव केमिकल्स में से एक है। जब कोई व्यक्ति स्मोकिंग करता है, तो निकोटीन धुएं के जरिए फेफड़ों से होता हुआ कुछ ही सेकंड्स में दिमाग तक पहुंच जाता है। दिमाग में पहुंचते ही यह डोपामाइन रिलीज करता है, जिसे फील-गुड या रिवॉर्ड हार्मोन भी कहते हैं।</p>
<p>इससे व्यक्ति को सुकून और खुशी का एहसास होता है। धीरे-धीरे दिमाग को इस नकली सुकून की आदत लग जाती है। जब निकोटीन का असर खत्म होता है, तो दिमाग फिर से उसकी मांग करता है। यही से सिगरेट या तंबाकू की लत शुरू होती है, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।</p>
<p><strong>विड्रॉल सिंड्रोम का डर<br /></strong>जब कोई व्यक्ति तंबाकू छोड़ने की कोशिश करता है, तो उसका शरीर और दिमाग इसके खिलाफ रिएक्ट करते हैं। इसे मेडिकल भाषा में निकोटीन विड्रॉल कहते हैं। स्मोकिंग बंद करने के कुछ ही घंटों के अंदर व्यक्ति को घबराहट, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, फोकस में कमी, उदासी और बेचैनी होने लगती है। कई लोग इस शारीरिक और मानसिक तकलीफ को बर्दाश्त नहीं कर पाते और इससे बचने के लिए दोबारा सिगरेट पीना शुरू कर देते हैं।</p>
<p><strong>तंबाकू का जाल<br /></strong>ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (GATS-2) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 26.7 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू की लत की चपेट में हैं। बड़े पैमाने पर लोग खैनी, गुटका और जर्दा जैसे धुआं रहित तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि वे सिगरेट नहीं पीतीं, इसलिए कई बार उन्हें लगता है कि वे सुरक्षित हैं, जो कि एक भ्रम है।</p>
<p>वहीं, शहरी और कामकाजी युवा महिलाओं में तनाव और पीयर प्रेशर के कारण सिगरेट पीने का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके कारण कई तरह के कैंसर का खतरा काफी तेजी से लोगों में बढ़ा है।</p>
<p><strong>कॉर्पोरेट मार्केटिंग की चालें<br /></strong>तंबाकू कंपनियां अब युवाओं और महिलाओं को लुभाने के लिए नए-नए पैंतरे अपना रही हैं। बाजार में फ्लेवर्ड सिगरेट, ई-सिगरेट, स्लिम सिगरेट और निकोटीन पाउच उतारे जा रहे हैं। इन्हें कूल लाइफस्टाइल के रूप में पेश किया जाता है, जिससे टीनएजर्स और युवा आसानी से इस जाल में फंस जाते हैं।</p>
<p><strong>इस लत से छुटकारा कैसे पा सकते हैं?<br /></strong>निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी- निकोटीन च्युइंग गम या पैच की मदद से धीरे-धीरे लत को कम किया जाता है।<br />बिहेवियरल थेरेपी- काउंसिलिंग के जरिए उन ट्रिगर्स को पहचानना और बदलना सिखाया जाता है।<br />पारिवारिक सपोर्ट- अपनों का साथ और हौसला इस मुश्किल सफर को आसान बना देता है।</p>
</div>
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			</item>
		<item>
		<title>बार-बार सनबर्न से बढ़ जाता है स्किन कैंसर का खतरा</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162248/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 May 2026 06:32:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[गर्मियों का मौसम आते ही लोग तेज धूप और पसीने से परेशान होने लगते हैं। इस मौसम में तेज धूप के कारण रेडनेस, जलन होना और सनबर्न होना काफी आम समस्या है, जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन सनबर्न की समस्या को मामूली समझना खतरनाक साबित हो सकता है। दरअसल, सनबर्न की समस्या &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="780" height="397" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/5-34.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/5-34.jpg 780w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/5-34-768x391.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px"></p>
<p>गर्मियों का मौसम आते ही लोग तेज धूप और पसीने से परेशान होने लगते हैं। इस मौसम में तेज धूप के कारण रेडनेस, जलन होना और सनबर्न होना काफी आम समस्या है, जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन सनबर्न की समस्या को मामूली समझना खतरनाक साबित हो सकता है।</p>
<p>दरअसल, सनबर्न की समस्या स्किन कैंसर का भी रूप ले सकती है। इसलिए इससे सावधान रहना और बचाव करना काफी जरूरी है। आइए इस बारे में डॉ. पर्ल आनंद (कंसल्टेंट, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, एंड्रोमेडा कैंसर हॉस्पिटल, सोनीपत) से जानते हैं।</p>
<p><strong>क्या सनबर्न के कारण स्किन कैंसर हो सकता है?<br /></strong>डॉ. आनंद बताती हैं कि बार-बार सनबर्न होने से भविष्य में स्किन कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है। ज्यादा समय तक धूप में रहने से हमारी त्वचा लगातार यूवी किरणों के संपर्क में आती है, जिससे स्किन सेल्स के डैमेज होने का रिस्क बढ़ जाता है।</p>
<p>जब त्वचा का DNA डैमेज हो जाता है, तो सेल्स असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, जो धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले लेती हैं।सनबर्न के कारण तीन तरह के स्किन कैंसर का खतरा बढ़ता है-</p>
<p>मेलानोमा- यह सबसे खतरनाक प्रकार का स्किन कैंसर है।<br />बेसल सेल कार्सिनोमा<br />स्कवैमस सेल कार्सिनोमा</p>
<p>ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अगर बचपन या टीनएज में किसी को गंभीर सनबर्न हुआ हो, तो बड़े होने पर उसमें स्किन कैंसर विकसित होने का जोखिम कई गुना ज्यादा हो जाता है। इसलिए सनबर्न को केवल टैनिंग समझकर नजरअंदाज करने की भूल बिल्कुल न करें।</p>
<p><strong>गर्मियों में सनबर्न से बचने के उपाय<br /></strong>गर्मी के मौसम में धूप से पूरी तरह बचना मुमकिन नहीं है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतकर सनबर्न से बचा जा सकता है-</p>
<p>बाहर निकलने से बचें- सुबह 10 बजे से दोपहर 4 बजे के बीच सूरज की यूवी किरणें सबसे ज्यादा तेज और हानिकारक होती हैं। कोशिश करें कि इस दौरान सीधे धूप में जाने से बचें। अगर बाहर जाना जरूरी हो, तो कोशिश करें कि आप छांव में रहें।</p>
<p>सनस्क्रीन का नियमित इस्तेमाल- धूप में निकलने से कम से कम 20-30 मिनट पहले एसपीएफ 30 या उससे ज्यादा का ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन जरूर लगाएं। ध्यान रहे कि सनस्क्रीन का असर केवल 2 से 3 घंटे ही रहता है। इसलिए अगर आप लंबे समय तक बाहर हैं, या आपको बहुत पसीना आ रहा है या स्विमिंग कर रहे हैं, तो हर 2 घंटे में सनस्क्रीन दोबारा लगाएं।</p>
<p>कपड़े और एक्सेसरीज पहनें- गर्मियों में हल्के रंग के, सूती और पूरी बाजू के कपड़े पहनें। इसके अलावा, बाहर निकलते समय चौड़े किनारे वाली टोपी पहनें जिससे चेहरा, कान और गर्दन ढके रहें। यूवी-प्रोटेक्टिव सनग्लासेस लगाएं।</p>
<p>खुद को हाइड्रेटेड रखें- तेज धूप में शरीर से पानी बहुत जल्दी खत्म होता है। त्वचा की नमी बनाए रखने और सनबर्न के असर को कम करने के लिए दिनभर में भरपूर पानी, नारियल पानी या नींबू पानी पीते रहें।</p>
<p><strong>डॉक्टर से कब संपर्क करें?<br /></strong>सनबर्न केवल कुछ दिनों की जलन नहीं है, यह त्वचा को लंबे समय में नुकसान पहुंचाता है। इसलिए कुछ संकेत दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए-</p>
<p>त्वचा पर बार-बार ज्यादा रेडनेस, जलन या छाले पड़ना।<br />शरीर पर मौजूद किसी तिल या मस्से के आकार, रंग या बनावट में बदलाव आना।<br />त्वचा पर कोई ऐसा घाव या दाग होना जो लंबे समय से ठीक न हो रहा हो।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>फिटनेस ही नहीं, दिमागी क्षमता भी बढ़ाती है साइकिलिंग</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162244/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 May 2026 12:32:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[बचपन में या फिटनेस के लिए हम सभी ने कभी न कभी साइकिल जरूर चलाई होगी और इसे एक बेहतरीन व्यायाम भी माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि साइकिल चलाने का फायदा सिर्फ आपके शरीर तक ही सीमित नहीं है? हाल ही में हुए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="781" height="371" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/1-15.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/1-15.jpg 781w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/1-15-768x365.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 781px) 100vw, 781px"></p>
<p>बचपन में या फिटनेस के लिए हम सभी ने कभी न कभी साइकिल जरूर चलाई होगी और इसे एक बेहतरीन व्यायाम भी माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि साइकिल चलाने का फायदा सिर्फ आपके शरीर तक ही सीमित नहीं है?</p>
<p>हाल ही में हुए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि साइकिल चलाना आपके मस्तिष्क को स्वस्थ रखने, मूड को बेहतर बनाने और आपके सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का एक बेहद सुलभ और शानदार तरीका हो सकता है। आइए जानते हैं कि इस दिलचस्प शोध में और क्या-क्या बातें सामने आई हैं।</p>
<h3 class="wp-block-heading">किसने किया यह शोध और क्यों?</h3>
<p>आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और लोगों की शारीरिक गतिविधियां कम होती जा रही हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों का मकसद एक ऐसे सस्ते और असरदार तरीके की पहचान करना था, जो इन समस्याओं से निपटने में मददगार साबित हो।</p>
<p>यह महत्वपूर्ण शोध अमेरिका की गैर-लाभकारी संस्था ‘आउटराइड’, ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय और लोमा लिंडा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया है।</p>
<p><strong>इस सटीक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने बहुत व्यापक स्तर पर काम किया:</strong></p>
<p>उन्होंने 19 देशों के डेटा को खंगाला, जिनमें अमेरिका, कनाडा और कई यूरोपीय देश शामिल हैं।<br />इन देशों में किए गए लगभग 90 अलग-अलग अध्ययनों की बारीकी से समीक्षा की गई।<br />यह पूरी रिसर्च मशहूर पत्रिका ‘फ्रंटियर्स इन स्पोर्ट्स एंड एक्टिव लिविंग’ में प्रकाशित की गई है।</p>
<p><strong>दिमाग और मूड पर कैसे होता है असर?<br /></strong>शोध के नतीजे बेहद सकारात्मक हैं। विश्लेषण से यह साफ हुआ है कि साइकिलिंग का सीधा और सकारात्मक असर हमारे दिमाग के काम करने के तरीके पर पड़ता है।</p>
<p><strong>अध्ययन में साइकिल चलाने के ये प्रमुख फायदे बताए गए हैं:</strong></p>
<p>तेज प्रतिक्रिया और फोकस: साइकिल चलाने से लोगों का ‘रिएक्शन टाइम’ बेहतर होता है और किसी भी काम में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है।<br />दिमागी क्षमता में सुधार: इससे संज्ञानात्मक प्रदर्शन से जुड़े मस्तिष्क के कार्य बेहतर होते हैं।<br />तनाव और अवसाद से दूरी: इसका नियमित अभ्यास मूड को अच्छा बनाता है और डिप्रेशन के लक्षणों को कम करने में भी मदद करता है।<br />बेहतर सामाजिक जीवन: साइकिलिंग को सामाजिक संबंधों में वृद्धि करने और समग्र कल्याण में सुधार से भी जोड़ा गया है।</p>
<p><strong>आगे क्या हैं संभावनाएं?<br /></strong>हालांकि, इस शोध ने साइकिल चलाने के कई बेहतरीन फायदों पर मुहर लगाई है, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इस दिशा में अभी और काम करने की जरूरत है। उनका सुझाव है कि भविष्य में युवाओं, बुजुर्गों और ऐसे समुदायों के बीच जो अभी भी इन सुविधाओं की पहुंच से दूर हैं, वहां और अधिक रिसर्च की जानी चाहिए।</p>
<p>कुल मिलाकर, यह अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि साइकिल चलाना खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रखने का एक बेहद सुलभ, कम लागत वाला और प्रभावी जरिया है।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>एनीमिया के इलाज में फोलिक एसिड जितनी ही कारगर हैं ये आयुर्वेदिक दवाएं</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162107/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 06:32:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा संयुक्त रूप से किए गए बहु केंद्रित क्लिनिकल परीक्षण में पाया गया है कि आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के उपचार के लिए उपयोग की जाने वाली दो आयुर्वेदिक औषधियां मध्यम एनीमिया वाली महिलाओं में म आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="629" height="444" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/ykhj.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा संयुक्त रूप से किए गए बहु केंद्रित क्लिनिकल परीक्षण में पाया गया है कि आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के उपचार के लिए उपयोग की जाने वाली दो आयुर्वेदिक औषधियां मध्यम एनीमिया वाली महिलाओं में म आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन के समान प्रभावी हैं। फेज- 3 रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (आरसीटी) के नतीजे 20 मई को आरसीएमआर द्वारा आयोजित “पहला आइसीएमआर वार्षिक क्लिनिकल ट्रायल मीट 2026 ” के दौरान पेश किए गए।</p>
<p><strong>समान रूप से प्रभावी<br /></strong>केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस अध्ययन में आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के इलाज में आयुर्वेदिक दवाओं अकेले पुनर्नवाड़ी मंडूर और द्राक्षावलेह के साथ मिलाकर प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया। भारत में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया एक बड़ी जन स्वास्थ्य समस्या है। इस अध्ययन में इन आयुर्वेदिक दवाओं की तुलना पारंपरिक आयरन फोलिक एसिड थेरेपी से की गई। यह परीक्षण लगभग 4,000 गैर – गर्भवती महिलाओं के बीच किया गया, जो 18- 49 आयु वर्ग में मध्यम एनीमिया से ग्रस्त थीं।</p>
<p>शोधकर्ताओं ने 90 दिनों की अवधि में हीमोग्लोबिन स्तर और अन्य क्लिनिकल परिणामों का मूल्यांकन किया। बयान में यह कहा गया कि निष्कर्षों ने यह दर्शाया कि दोनों आयुर्वेदिक हस्तक्षेप मानक आयरनफोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन के समान प्रभावी थे। राष्ट्रीय स्तर की इस बैठक में नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नियामक प्राधिकरणों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एकत्रित किया गया, ताकि भारत के क्लिनिकल परीक्षण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और साक्ष्य-आधारित समग्र चिकित्सा अनुसंधान को आगे बढ़ाने पर चर्चा की जा सके। कार्यक्रम में आइसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल व केंद्रीय आयुष सचिव राजेश कोटेचा सहित स्वास्थ्य और विज्ञानी समुदाय के विशेषज्ञों व हितधारकों ने भाग लिया।</p>
<p>आइसीएमआर और सेंट्रल काउंसिल फार रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज द्वारा मल्टीसेंट्रिक क्लिनिकल ट्रायल में पता चला<br />यह परीक्षण 18-49 आयु वर्ग की 4,000 ऐसी गैर गर्भवती महिलाओं पर किया गया, जो एनीमिया से पीड़ित थीं</p>
<p><strong>37 विशेषज्ञों के साथ विकसित की गई रिपोर्ट<br /></strong>गणमान्य व्यक्तियों ने उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने और स्वास्थ्य सेवा वितरण को सुदृढ़ बनाने के लिए मजबूत क्लिनिकल अनुसंधान प्रणालियों, नैतिक शासन और एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल पद्धतियों के वैज्ञानिक सत्यापन के महत्व पर ज़ोर दिया। इस कार्यक्रम के दौरान आइसीएमआर ने “भारत में ‘फर्स्ट-इन- ह्यूमन’ फेज 1 क्लिनिकल परीक्षणों को आगे बढ़ानाः विनियामक मार्गों और अवसरों पर एक डेल्फी अध्ययन” शीर्षक से एक रिपोर्ट भी जारी की।</p>
<p>यह रिपोर्ट फार्मास्यूटिकल उद्योग, अनुबंध अनुसंधान संगठनों, अकादमिक संस्थानों और राष्ट्रीय नियामक एजेंसियों के 37 विशेषज्ञों के साथ दो दौर की परामर्श के माध्यम से विकसित की गई थी, जिसमें भारत में प्रारंभिक चरण के क्लिनिकल परीक्षणों को आगे बढ़ाने में बाधाओं की पहचान की गई।</p>
<p>रिपोर्ट ने नियामक क्षमता को मजबूत करने, अनुमोदन तंत्र को सरल बनाने और एजेंसियों के बीच समन्वय में सुधार करने की सिफारिश की । इस कार्यक्रम में भारत में बहु केंद्र अनुसंधान के लिए एकल नैतिक समीक्षा के संचालन संबंधी दिशानिर्देश ” भी जारी किए गए, जिसका उद्देश्य देश भर में बहु-केंद्र अध्ययनों के लिए नैतिक समीक्षा तंत्र को समन्वयित करना है।</p>
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		<item>
		<title>कैसे मॉडर्न लाइफस्टाइल युवाओं के दिमाग को कर रही है खोखला?</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162049/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 May 2026 06:32:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[भारत में युवाओं में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। डिप्रेशन, एंग्जायटी, क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी समस्याएं सिर्फ उदासी या मूड खराब होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका युवाओं की सेहत और जिंदगी पर भी गहरा असर पड़ रहा है।  ऐसे में यब सवाल पूछना जरूरी हो जाता है कि युवाओं &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="618" height="353" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/jkgkjg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>भारत में युवाओं में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। डिप्रेशन, एंग्जायटी, क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी समस्याएं सिर्फ उदासी या मूड खराब होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका युवाओं की सेहत और जिंदगी पर भी गहरा असर पड़ रहा है। </p>
<p>ऐसे में यब सवाल पूछना जरूरी हो जाता है कि युवाओं में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं के पीछे क्या कारण हैं। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने <em><strong>डॉ. कुणाल बहरानी</strong></em> (चेयरमैन एंड ग्रुप डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी, यथार्थ हॉस्पिटल्स) से बात की। आइए जानें इस बारे में डॉक्टर क्या बताते हैं।  </p>
<h3 class="wp-block-heading">पढ़ाई का दबाव और न्यूरोलॉजिकल स्ट्रेस</h3>
<p>भारतीय समाज में करियर को लेकर उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं, नंबर लाने का दबाव और परिवार की उम्मीदें टीनएजर्स में क्रॉनिक स्ट्रेस को जन्म दे रही हैं। जब कोई युवा लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो उसके शरीर में कोर्टिसोल नाम के स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। </p>
<p>न्यूरोलॉजी के अनुसार, कोर्टिसोल बढ़ने से दिमाग की याद रखने, नई चीजें सीखने और भावनाओं को कंट्रोल करने की क्षमता को नुकसान पहुंचता है।</p>
<p><strong>डिजिटल दुनिया का मायाजाल<br /></strong>आजकल युवाओं का ज्यादा समय रील्स और शॉर्ट्स देखते हुए बीतता है। इस डिजिटल हाइपरकनेक्टिविटी ने हमारे दिमाग के काम करने के तरीके को बदल दिया है। स्क्रीन पर मिलने वाले हर लाइक और नोटिफिकेशन से दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है।</p>
<p>इस वजह से युवाओं को स्क्रीन की लत लग जाती है, जो बाद में चिड़चिड़ापन, ध्यान न लगना, नींद की कमी और सिरदर्द जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं में बदल जाती है।</p>
<p><strong>अकेलेपन को बढ़ावा देती शहरी लाइफस्टाइल<br /></strong>बड़े शहरों में पढ़ाई और नौकरी के लिए युवाओं का पलायन तेजी से बढ़ा है। नए शहरों में जाकर युवा अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। ऑफिस में कड़ा मुकाबला, नौकरी जाने का डर और आर्थिक असुरक्षा उनके भीतर एंग्जायटी और डिप्रेशन को बढ़ा रही है।</p>
<p><strong>फ्रंटल लोब पर असर<br /></strong>कम उम्र में निकोटीन, शराब या ड्रग्स का इस्तेमाल दिमाग के विकास को रोक देता है। यह स्थिति खासतौर से फ्रंटल लोब को प्रभावित करती है, जो हमारे फैसले लेने की क्षमता को संभालता है।</p>
<p><strong>सामाजिक संकोच और लोक-लाज<br /></strong>आज भी भारत में मानसिक बीमारी को एक कलंक या कमजोरी माना जाता है। युवा इस डर से मदद नहीं मांगते कि समाज या परिवार क्या सोचेगा। इसका नतीजा यह होता है कि मानसिक तनाव अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है और शरीर में चक्कर आने, हर समय थकान रहने, भूलने की बीमारी या तेज सिरदर्द के रूप में बाहर आता है, जो आगे चलकर डिप्रेशन और एंग्जायटी का रूप ले लेता है।</p>
</div>
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		<title>पहला बच्चा पैदा करने के लिए क्यों 26 से 31 की उम्र है सबसे बेस्ट?</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162037/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 May 2026 06:32:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[क्या आप भी फैमिली प्लानिंग की सोच रहे हैं? अगर हां, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है। हाल ही में हुए एक बड़े अध्ययन से यह बात सामने आई है कि आप किस उम्र में अपने पहले बच्चे को जन्म देते हैं, इसका सीधा असर आपके भविष्य की सेहत, खुशी और यहां तक &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="799" height="388" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/kjhkl.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/kjhkl.jpg 799w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/kjhkl-768x373.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 799px) 100vw, 799px"></p>
<p>क्या आप भी फैमिली प्लानिंग की सोच रहे हैं? अगर हां, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है। हाल ही में हुए एक बड़े अध्ययन से यह बात सामने आई है कि आप किस उम्र में अपने पहले बच्चे को जन्म देते हैं, इसका सीधा असर आपके भविष्य की सेहत, खुशी और यहां तक कि आपकी आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है।</p>
<p>‘PLOS One’ में पब्लिश इस नई रिसर्च के अनुसार, पेरेंट्स बनने की उम्र आपकी लॉन्ग टर्म एजुकेशनल और फाइनेंशियल सक्सेस का एक बड़ा संकेत है। आइए जानते हैं कि क्यों इस रिसर्च में माता-पिता बनने की ‘परफेक्ट’ उम्र 26 से 31 बताई गई है।</p>
<h2 class="wp-block-heading">क्या है बच्चा पैदा करने की ‘परफेक्ट’ उम्र?</h2>
<p>जॉर्डन मैकडोनाल्ड और डेविड स्पीड नाम के शोधकर्ताओं ने इस विषय की गहराई तक जाने के लिए 6,282 माता-पिता के डेटा का विश्लेषण किया। उन्होंने ‘प्रतिबंधित क्यूबिक स्प्लाइन रिग्रेशन’ नामक एक विशेष सांख्यिकीय तकनीक का इस्तेमाल किया। इस स्टडी का खास मकसद यह जानना था कि कम उम्र में माता-पिता बनने के जो नुकसान होते हैं, वे किस उम्र में जाकर स्थिर होने लगते हैं।</p>
<p>आंकड़ों के विश्लेषण के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि, पहला बच्चा पैदा करने की सबसे बेहतरीन उम्र 26 से 31 साल के बीच है। अगर इसमें भी सबसे सटीक और बेस्ट ऐज की बात करें, तो वह 29 साल है।</p>
<p>रिसर्च में एक अहम बात यह भी सामने आई कि जो लोग कम उम्र में पेरेंट्स बन जाते हैं, वे उन लोगों के मुकाबले कम पैसा कमा पाते हैं जो बाद की उम्र में बच्चे पैदा करते हैं।</p>
<h2 class="wp-block-heading">26 से 31 की उम्र ही क्यों है सबसे खास?</h2>
<p>अब सवाल यह उठता है कि इसी खास उम्र को इतना आदर्श क्यों माना जा रहा है? शोधकर्ताओं ने इसके पीछे बेहद व्यावहारिक कारण बताए हैं:</p>
<p>करियर में स्थिरता: 26 से 31 साल की उम्र तक आते-आते ज्यादातर लोग अपनी नौकरी या बिजनेस में अच्छी तरह से सेटल हो जाते हैं।<br />कम दबाव और तनाव: आर्थिक और व्यावसायिक स्थिरता होने के कारण बच्चे की परवरिश का बोझ या दबाव कम महसूस होता है।<br />ज्यादा मैच्योरिटी: इस उम्र तक लोग मानसिक रूप से ज्यादा मैच्योर हो जाते हैं। वे अपनी जिम्मेदारियों और जीवन के तनाव को ज्यादा बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं।<br />मजबूत रिश्ते: ऐसे लोग अपने पारिवारिक जीवन और आपसी रिश्तों में भी ज्यादा स्थिर होते हैं, जो एक बच्चे के अच्छे माहौल के लिए जरूरी है।</p>
</div>
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		<item>
		<title>हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने के लिए इन 5 आदतों में भी करें सुधार</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/162019/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 May 2026 12:32:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[हाई ब्लड प्रेशर एक ऐसी बीमारी है, जो सालों तक बिना किसी लक्षण के शरीर में पनपती रहती है। यही वजह है कि इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है। अगर समय रहते इसे कंट्रोल न किया जाए, तो यह हमारे दिल, दिमाग और किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचाकर जानलेवा साबित हो सकता है। इसी गंभीरता &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="917" height="518" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/5-28.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/5-28.jpg 917w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/5-28-768x434.jpg 768w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/5-28-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 917px) 100vw, 917px"></p>
<p>हाई ब्लड प्रेशर एक ऐसी बीमारी है, जो सालों तक बिना किसी लक्षण के शरीर में पनपती रहती है। यही वजह है कि इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है। अगर समय रहते इसे कंट्रोल न किया जाए, तो यह हमारे दिल, दिमाग और किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचाकर जानलेवा साबित हो सकता है।</p>
<p>इसी गंभीरता को समझते हुए वर्ल्ड हाइपरटेंशन डे 2026 की थीम कंट्रोलिंग हाइपरटेंशन टुगेदर रखी गई है। इसका सीधा-सा संदेश है कि हम सब मिलकर अपने खान-पान और लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव करके अपने ब्लड प्रेशर और सेहत की रक्षा कर सकते हैं।</p>
<p>आइए, डॉ. अपेक्षा एकबोटे (चीफ डाइटिशियन, नेफ्रोप्लस) से जानते हैं उन आसान, लेकिन असरदार आदतों के बारे में, जिन्हें अपने रूटीन में शामिल कर आप इस साइलेंट किलर से खुद को बचा सकते हैं।</p>
<p><strong>नमक और पैकेज्ड फूड से बनाएं दूरी<br /></strong>हमारे शरीर में ब्लड प्रेशर बढ़ने का एक सबसे बड़ा कारण है ज्यादा नमक खाना। हमें दिनभर में 5 ग्राम (लगभग एक छोटा चम्मच) से कम नमक खाने का लक्ष्य रखना चाहिए। याद रखें, इसमें चिप्स, नमकीन, अचार, पापड़, सॉस और इंस्टेंट नूडल्स जैसे पैकेजों में छिपा हुआ नमक भी शामिल है।</p>
<p>आप इन नमकीन स्नैक्स की जगह भुने चने, स्प्राउट्स, वेजीटेबल कटलेट या सादे नट्स खा सकते हैं। इसके अलावा, दाल और सब्जियों में ऊपर से नमक डालने के बजाय नींबू, जीरा, अजवाइन, लहसुन और हर्ब्स का इस्तेमाल करके स्वाद बढ़ाएं।</p>
<p><strong>फल, सब्जियां और साबुत अनाज चुनें</strong><br />पौधों से मिलने वाले फूड्स ब्लड प्रेशर को कम करने और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। अपनी डाइट में रोजाना 2 से 3 सर्विंग्स फलों की और 3 से 4 सर्विंग्स सब्जियों की जरूर शामिल करें। इसके साथ ही, मैदे से बनी ब्रेड और सफेद चावल की जगह साबुत अनाज जैसे ब्राउन राइस, ओट्स, रागी, ज्वार, बाजरा और चोकर वाले गेहूं की रोटी को अपने खाने का हिस्सा बनाएं।</p>
<p><strong>सही फैट चुनें और तली-भुनी चीजों से बचें</strong><br />खाना पकाने के लिए सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी या राइस ब्रान जैसे वेजिटेबल ऑयल का सीमित मात्रा में इस्तेमाल करें। तेल को बार-बार गर्म करके तलने के लिए इस्तेमाल करने से बचें। समोसा, कचौड़ी, भजिया, सेव और भारी मिठाइयों जैसी तली-भुनी चीजों से दूरी बनाएं और उनकी जगह भाप में पके या बेक की हुई डिशेज का आनंद लें। खाना बनाते समय बोतल से सीधा तेल डालने के बजाय चम्मच से नापकर ही इस्तेमाल करें।</p>
<p><strong>पोटैशियम से भरपूर चीजें खाएं</strong><br />पोटैशियम हमारे शरीर में सोडियम के स्तर को संतुलित रखता है, जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है। इसके लिए अपने रोज के खान-पान में केला, चीकू, संतरा, नारियल पानी, हरी पत्तेदार सब्जियां, आलू, बीन्स और रागी को नियमित रूप से शामिल करें।</p>
<p><strong>चीनी, कैफीन और अल्कोहल को कहें ना</strong><br />ज्यादा चीनी और शराब से न सिर्फ वजन बढ़ाता है, बल्कि ब्लड प्रेशर भी गंभीर रूप से प्रभावित होता है। इसलिए सोडा, पैक्ड जूस, मिठाई और बेकरी की चीजों से परहेज करें। साथ ही, शराब बिल्कुल न पिएं।</p>
<p><strong>एक्टिव रहें और वजन कंट्रोल करें</strong><br />फिजिकल एक्टिविटी का ब्लड प्रेशर से सीधा कनेक्शन है। अपने वजनऔर बीपी को काबू करने के लिए रोजाना कम से कम 30 से 45 मिनट ब्रिस्क वॉक, योग या कोई भी हल्की एक्सरसाइज करें।</p>
</div>
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			</item>
		<item>
		<title>रोजाना कॉफी पीने वालों में कम रहता है डिमेंशिया का खतरा</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/161973/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 May 2026 06:32:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[हम में से बहुत से लोगों के दिन की शुरुआत एक गरमा-गरम एस्प्रेसो या कैपेचीनो से होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यह रोजाना की आदत आपको एक बहुत बड़ी बीमारी से बचा सकती है? जी हां, हाल ही में सामने आए एक अध्ययन से यह पता चला है कि रोजाना दो &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="776" height="386" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/2-14.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/2-14.jpg 776w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/2-14-768x382.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 776px) 100vw, 776px"></p>
<p>हम में से बहुत से लोगों के दिन की शुरुआत एक गरमा-गरम एस्प्रेसो या कैपेचीनो से होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यह रोजाना की आदत आपको एक बहुत बड़ी बीमारी से बचा सकती है?</p>
<p>जी हां, हाल ही में सामने आए एक अध्ययन से यह पता चला है कि रोजाना दो से तीन कप कॉफी पीने से उम्र बढ़ने के साथ डिमेंशिया का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।</p>
<p><strong>कैसे काम करती है कॉफी?<br /></strong>शोधकर्ताओं के अनुसार, कॉफी में मौजूद कैफीन हमारे दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय रखने में बेहद मददगार है। इतना ही नहीं, यह अल्जाइमर से जुड़ी सूजन और दिमाग में जमा होने वाले हानिकारक प्लाक को भी कम करने में सहायता करता है। इसका मतलब यह है कि रोजाना कॉफी पीने की आदत आपको सिर्फ ताजगी और ऊर्जा ही नहीं देती, बल्कि आपके दिमाग की रक्षा भी करती है।</p>
<p><strong>क्या कहता है 43 साल लंबा अध्ययन?<br /></strong>इस बात को साबित करने के लिए अमेरिका में एक बहुत बड़ा शोध किया गया। इस शोध में 1,31,821 नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों को शामिल किया गया। इन सभी लोगों पर पूरे 43 सालों तक नजर रखी गई। जब यह अध्ययन शुरू हुआ, तब प्रतिभागियों की उम्र 40 वर्ष के आसपास थी। अध्ययन के दौरान लगभग 11,033 लोगों (यानी कुल लोगों का 8 प्रतिशत) में डिमेंशिया की समस्या देखी गई।</p>
<p>हालांकि, शोधकर्ताओं ने एक बहुत ही दिलचस्प बात नोटिस की। जो लोग नियमित रूप से कैफीनयुक्त कॉफी या चाय का सेवन करते थे, उनमें डिमेंशिया विकसित होने की संभावना काफी कम थी। इस आदत का सबसे अधिक फायदा 75 वर्ष और उससे कम आयु के वयस्कों में देखा गया।</p>
<p><strong>हर चीज की बुरी है अति<br /></strong>विज्ञानियों ने इसके फायदों के साथ-साथ एक जरूरी सलाह भी दी है। उनका कहना है कि मध्यम मात्रा में कॉफी या चाय पीना ही फायदेमंद है। अगर आप यह सोचकर बहुत ज्यादा कॉफी पीने लगेंगे कि इससे ज्यादा फायदा होगा, तो यह गलत है। हद से ज्यादा कॉफी पीने से इसका यह सुरक्षात्मक प्रभाव कम होने लगता है।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पानी की कमी से गर्मियों में बढ़ सकती है पेट की गर्मी और गैस!</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/161921/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 May 2026 06:32:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[अगर पेट में लगातार दर्द बना रहता है तो इसे अनदेखा न करें। जल्द से जल्द किसी कुशल चिकित्सक से आपको संपर्क करना चाहिए। गर्मी के दिनों में उच्च तापमान और शरीर में पानी की कमी अर्थात डिहाइड्रेशन के कारण पेट संबंधी समस्याएं काफी बढ़ जाती हैं। यही नहीं इन दिनों शरीर से पसीने के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="780" height="408" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/1-6.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/05/1-6.jpg 780w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/05/1-6-768x402.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px"></p>
<p>अगर पेट में लगातार दर्द बना रहता है तो इसे अनदेखा न करें। जल्द से जल्द किसी कुशल चिकित्सक से आपको संपर्क करना चाहिए। गर्मी के दिनों में उच्च तापमान और शरीर में पानी की कमी अर्थात डिहाइड्रेशन के कारण पेट संबंधी समस्याएं काफी बढ़ जाती हैं। यही नहीं इन दिनों शरीर से पसीने के रूप में भी काफी मात्रा में पानी निकल जाता है।</p>
<p>पानी की कमी होने पर पेट के अंदर बैड बैक्टीरिया को पनपने के लिए अनुकूल माहौल मिल जाता है। इस कारण पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं। शरीर में पानी की कमी के कारण पेट में एसिड की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है। इससे पेट और सीने में जलन होने लगती है। पानी की कमी होने पर कब्ज की समस्या भी बढ़ जाती है। इसके साथ ही ब्लोटिंग अर्थात पेट फूलने और पेट में गैस बनने की समस्या भी सामने आती है।</p>
<h3 class="wp-block-heading">खानपान में सतर्कता है जरूरी</h3>
<p>गर्मी के दिनों ज्यादा फैट वाले भोजन का प्रयोग करना भी हानिकारक साबित हो सकता है। ज्यादा फैट युक्त भोजन का सेवन करने से अपच संबंधी समस्या सामने आ सकती हैं। इससे पेट में जलन की समस्या भी बढ़ सकती है। गर्मी के दिनों में बहुत से लोग आइसक्रीम और अन्य ठंडे पेय पदार्थों का यह सोचकर सेवन बढ़ा देते हैं कि ये तो ठंडे पदार्थ हैं, लेकिन ठंडे तापमान और शक्कर की अधिक मात्रा का संयोजन पेट संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है। यही नहीं जो लोग लैक्टोज या डेयरी उत्पादों के प्रति संवेदनशील हैं, उनके लिए भी ये खाद्य पदार्थ पेट में गैस, ऐंठन और दस्त का कारण बन सकते हैं।</p>
<p><strong>पेट संबंधी समस्याओं से ऐसे होगा बचाव<br /></strong>अगर आपको किडनी संबंधी और पेट संबंधी अन्य कोई समस्या नहीं है तो गर्मी के दिनों में दिनभर में कम से कम ढाई से तीन लीटर पानी अवश्य पिएं।<br />इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी पूरी करने के लिए नींबू की शिकंजी, नारियल पानी या ओआरएस का घोल लें। नारियल पानी पेट के पीएच स्तर को संतुलित रखने में मदद करता है।<br />ठंडी तासीर वाले खाद्य पदार्थों का भरपूर सेवन करें, जैसे दही, छाछ, रायता, लस्सी। इनसे पेट की गर्मी शांत होती है और पाचनतंत्र सही रहता है।<br />पेट और पाचनतंत्र को सही रखने के लिए मौसमी फलों का सेवन अवश्य करें, जैसे तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी आदि। इनमें पानी की मात्रा काफी अधिक होती है। इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होने पाती है।<br />गर्मी के दिनों में बाहर का खाना खासकर स्ट्रीट फूड खाने से अवश्य बचें।<br />बाहर के खाने के बजाय घर का बना ताजा खाना खाएं। इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि खाना हल्का अर्थात जल्दी पचने वाला हो, उसमें तेल-मसाले का प्रयोग कम किया गया हो।</p>
<p><strong>बनाएं दूरी<br /></strong>बहुत अधिक मात्रा में चाय या काफी का सेवन न करें।<br />विभिन्न प्रकार के कार्बोनेटेड ड्रिंक्स का सेवन कम से कम करें।<br />डिब्बाबंद और प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें।<br />अधिक तैलीय भोजन का सेवन न करें।</p>
<p><strong>पेट की गर्मी बढ़ने के कारण<br /></strong>मसालेदार और अधिक तैलीय भोजन का सेवन, इससे पेट में एसिड की मात्रा बढ़ जाती है।<br />खानपान में अनियमितता, समय से भोजन न करना, अधिक मात्रा में खा लेना, भोजन का बिल्कुल सेवन न करना, देर रात भोजन करना, इससे पाचनतंत्र प्रभावित होता है।<br />शरीर में पानी की कमी, कम मात्रा में पानी पीने से पाचनक्रिया खराब होती है और एसिडिटी की मात्रा भी बढ़ जाती है।<br />शरीर में अधिक कैफीन का पहुंचना, इससे पेट की अंदरूनी परत में जलन होने लगती है।<br />तनाव और चिंता, इनसे भी शरीर में एसिड का उत्पादन अधिक मात्रा में होने लगता है। इससे पेट की गर्मी बढ़ जाती है।<br />नींद की कमी, अपर्याप्त नींद न केवल पाचनक्रिया को प्रभावित करती है, बल्कि पेट के अंदर की गर्मी को भी बढ़ा देती है।</p>
<p><strong>डॉक्टर से मिलें, अगर<br /></strong>अगर घरेलू उपायों से पेट संबंधी समस्याओं में आराम न मिले।<br />पेट में जलन लगातार बनी रहे और दर्द भी हो।<br />बार-बार उल्टी या दस्त हों।<br />वजन में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा हो।</p>
<p><strong>घरेलू उपाय हैं बहुत लाभकारी<br /></strong>वैद्य अच्युत कुमार त्रिपाठी (सदस्य एवं गुरु राष्ट्रीय आर्युवेद विद्यापीठ) के मुताबिक इस मौसम में जिस प्रकार से प्रकृति में जलीय तत्वों की कमी हो जाती है, ठीक उसी प्रकार से शरीर में। गर्मी में वात, पित्त में असंतुलन हो जाने के कारण उदर संबंधी समस्याएं काफी बढ़ जाती हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए जरूरी है कि हम कुछ घरेलू उपायों पर अमल करें।</p>
<p>इसके लिए रात में थोड़ी सूखी धनिया, कच्चा जीरा और सौंफ को रात में भिगो दें। सुबह इन तीनों को पीस लें। इस मिश्रण से एक चम्मच मात्रा लेकर एक गिलास पानी में मिलाकर पिएं। आप इसमें ग्लूकोज भी मिला सकते हैं।<br />इस मिश्रण को फ्रिज में स्टोर कर सकते हैं। कच्ची या भुनी हुई सौंफ में थोड़ी सी मिश्री मिलाकर खाने से भी आराम मिलता है।<br />इसी तरह छाछ के साथ सेंधा नमक, भुना पिसा जीरा मिलाकर पीने से भी राहत मिलती है। इनसे भूख भी बढ़ती है।<br />इस मौसम में बेल का मुरब्बा और बेल का शर्बत पीने से भी काफी आराम मिलता है। बेल का पाउडर भी खाया जा सकता है।<br />आजवाइन, जीरा, कलौंजी और एक या दो ग्राम हींग, छोटी हर्र देसी घी में पकाकर पीस लें। इसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिला सकते हैं। खाना खाने के बाद इसे खा सकते हैं।<br />रात में बीज निकालकर मुनक्का को पानी में भिगो दें, सुबह इसे खा सकते हैं। रात में त्रिफला चूर्ण भी खा सकते हैं। इसे पानी या दूध किसी के साथ ले सकते हैं।<br />25 दाने किशमिश, दो अंजीर, पांच टुकड़े अखरोट, पांच बादाम रात में भिगो दें और सुबह नाश्ते पहले इन्हें अच्छी तरह चबाकर खाएं। इसके साथ एक कप दूध ले लें। इससे उदर रोगों के साथ ही कोलेस्ट्राल और ब्लड प्रेशर संबंधी समस्याओं से भी राहत मिलती है साथ ही शरीर को पोषण।<br />इन्हें स्टील, कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में ही भिगोएं। इसके साथ ही तरबूज और खरबूजा का सेवन अवश्य करें। बस, इन्हें खाने के बाद थोड़ी देर तक पानी बिल्कुल न पिएं।<br />आम का पना, गन्ने का रस भी बहुत लाभदायक होता है। हर मौसम में पाए जाने वाले फल, उस ऋतु में होने वाली समस्याओं से राहत दिलाते हैं।</p>
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