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	<title>सेहत &#8211; Fastball Files | Sports News &amp; More</title>
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	<description>Sports News, Lifestyle &#38; Entertainment Articles</description>
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	<title>सेहत &#8211; Fastball Files | Sports News &amp; More</title>
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		<title>बिना चोट के शरीर पर नील पड़ना या जोड़ों में दर्द हो सकता है इस गंभीर बीमारी का संकेत</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/161134/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 06:33:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[गिरने या हल्की-सी चोट लगने पर शरीर पर नील पड़ जाना एक बहुत ही आम बात है, लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि बिना किसी स्पष्ट कारण के आपके शरीर पर बार-बार नील पड़ रहे हैं? या फिर मामूली-सी चोट लगने के बाद भी आपके जोड़ों में बार-बार सूजन और दर्द रहने लगा &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img width="576" height="304" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/5-9.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>गिरने या हल्की-सी चोट लगने पर शरीर पर नील पड़ जाना एक बहुत ही आम बात है, लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि बिना किसी स्पष्ट कारण के आपके शरीर पर बार-बार नील पड़ रहे हैं?</p>
<p>या फिर मामूली-सी चोट लगने के बाद भी आपके जोड़ों में बार-बार सूजन और दर्द रहने लगा है? <em><strong>डॉ. उर्मी शेठ (कंसल्टेंट क्लिनिकल हेमेटोलॉजिस्ट, इनामदार मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, पुणे)</strong></em> का कहना है कि अगर ऐसा है, तो इसे नॉर्मल मानकर अनदेखा न करें। यह ‘हीमोफीलिया’ जैसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। आइए, डिटेल में जानते हैं इस बारे में।</p>
<p><strong>हीमोफीलिया क्या है और इसके लक्षण कैसे होते हैं?<br /></strong>हीमोफीलिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में खून का थक्का ठीक से नहीं बन पाता है। इसका मुख्य कारण खून में जरूरी ‘क्लॉटिंग फैक्टर्स’ की कमी होना है।</p>
<p>ज्यादातर लोगों को लगता है कि हीमोफीलिया का मतलब सिर्फ कटने पर खून का न रुकना है, लेकिन ऐसा नहीं है। खासकर बच्चों और युवाओं में इसके कुछ शुरुआती और प्रमुख लक्षण इस प्रकार देखे जाते हैं:</p>
<p>बार-बार नील पड़ना: बिना किसी वजह या हल्की चोट पर ही शरीर पर नीले निशान उभर आना।<br />जोड़ों में समस्या: घुटनों, टखनों और कोहनियों में दर्द और सूजन होना।<br />दांतों के इलाज के बाद: लंबे समय तक खून बहते रहना।<br />नाक से खून आना: बार-बार नकसीर फूटना।</p>
<p><strong>जोड़ों के लिए क्यों है यह खतरनाक?<br /></strong>डॉक्टर का कहना है कि कई बार हीमोफीलिया के कारण शरीर के अंदर ही अंदर, विशेषकर जोड़ों में खून जमा होने लगता है। शुरुआत में यह हल्के दर्द, जकड़न, उस हिस्से के गर्म होने या चलने-फिरने में होने वाली परेशानी के रूप में सामने आता है। अगर समय पर इसका सही इलाज न किया जाए, तो यह लगातार दर्द का कारण बन सकता है और हमेशा के लिए जोड़ों को खराब कर सकता है, जिससे चलने-फिरने में स्थायी दिक्कत आ सकती है।</p>
<p><strong>क्या हर बार नील पड़ना हीमोफीलिया है?<br /></strong>बिल्कुल नहीं! यह जानना बहुत जरूरी है कि हर बार नील पड़ना या जोड़ों में दर्द होना हीमोफीलिया का ही लक्षण नहीं होता। इसके पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे:</p>
<p>प्लेटलेट्स से जुड़ी कोई समस्या<br />शरीर में विटामिन्स की कमी<br />लिवर से संबंधित बीमारियां<br />वॉन विलेब्रांड रोग<br />कुछ खास दवाओं के साइड इफेक्ट्स<br />जोड़ों की सूजन से जुड़ी अन्य बीमारियां</p>
<p>इसलिए, इंटरनेट पर पढ़कर या लक्षणों को देखकर बिना किसी जांच के खुद से कोई भी निष्कर्ष निकालना बिल्कुल गलत है।</p>
<p><strong>कैसे होती है इस बीमारी की सही पहचान?<br /></strong>सही बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर द्वारा पूरी जांच होना बहुत जरूरी है। एक सटीक डायग्नोस तक पहुंचने के लिए डॉक्टर इन चीजों पर ध्यान देते हैं:</p>
<p>मेडिकल और फैमिली हिस्ट्री: मरीज की पुरानी बीमारियां और यह जानना कि परिवार में पहले किसी को यह बीमारी थी या नहीं।<br />शारीरिक परीक्षण: मरीज की स्थिति की बारीकी से जांच करना।<br />खून की जांच: इसमें मुख्य रूप से ‘कोएगुलेशन प्रोफाइल’ और क्लॉटिंग फैक्टर की जांच की जाती है। इससे डॉक्टर यह पता लगाते हैं कि खून में ‘फैक्टर VIII’ या ‘फैक्टर IX’ की कमी है या नहीं, और अगर है तो बीमारी कितनी गंभीर स्थिति में है।</p>
<p><strong>याद रखने वाली बात<br /></strong>सबसे जरूरी बात यह है कि अगर आपको या आपके किसी जानने वाले को बार-बार बिना कारण नील पड़ने, मामूली चोट पर जोड़ों में सूजन आने, बार-बार नाक से खून आने या चोट लगने पर ज्यादा देर तक खून बहने जैसी समस्या हो रही है, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें।</p>
<p>ऐसे में, तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। समय पर बीमारी की पहचान और सही इलाज से हीमोफीलिया को बहुत ही बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे मरीज एक सामान्य जीवन जी सकता है।</p>
</div>
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		<title>40 डिग्री की गर्मी और लू का काल है ये देसी ड्रिंक</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/161126/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:32:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। तापमान 40 डिग्री को छूने वाला है, जिसके साथ हीटवेव का आगाज हो सकता है। चिलचिलाती धूप के कारण डिहाइड्रेशन और लू लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इन परेशानियों से बचने के लिए भारतीय सालों से एक खास देसी ड्रिंक का इस्तेमाल कर रहे हैं। हम &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="912" height="465" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/78-4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/78-4.jpg 912w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/04/78-4-768x392.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 912px) 100vw, 912px"></p>
<p>गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। तापमान 40 डिग्री को छूने वाला है, जिसके साथ हीटवेव का आगाज हो सकता है। चिलचिलाती धूप के कारण डिहाइड्रेशन और लू लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इन परेशानियों से बचने के लिए भारतीय सालों से एक खास देसी ड्रिंक का इस्तेमाल कर रहे हैं।</p>
<p>हम बात कर रहे हैं आम पन्ना की। आम पन्ना एक ऐसा ड्रिंक है, जो स्वाद में लाजबाव होने के साथ-साथ लू से बचाने में भी रामबाण है। इसका खट्टा-मीठा और चटपटा स्वाद हर उम्र के व्यक्ति को पसंद आता है। आइए जानें गर्मी के मौसम में आम पन्ना पीने के क्या फायदे हैं और इसे बनाने की रेसिपी क्या है।</p>
<p><strong>आम पन्ना पीने के फायदे<br /></strong>लू से सुरक्षा- गर्मियों में चलने वाली गर्म हवाएं शरीर की नमी सोख लेती हैं। आम पन्ना शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स के बैलेंस को बनाए रखता है और लू लगने के खतरे को कम करता है।<br />पाचन में सहायक- कच्चे आम में पेक्टिन होता है, जो पेट की समस्याओं जैसे अपच, कब्ज और दस्त के इलाज में मदद करता है। इसमें मौजूद काला नमक और जीरा पाचन तंत्र को सुचारू बनाते हैं।<br />इम्युनिटी बूस्टर- यह विटामिन-सी से भरपूर होता है, जो आपकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है और इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करता है।<br />खून की कमी दूर करना- कच्चे आम में आयरन की मात्रा अच्छी होती है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को सुधारने में मददगार है।<br />त्वचा और आंखों के लिए- विटामिन-ए और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होने के कारण यह आपकी आंखों की रोशनी और त्वचा की चमक को भी बरकरार रखता है।</p>
<p><strong>आम पन्ना बनाने की रेसिपी<br /></strong>आम पन्ना बनाना बहुत ही आसान है, जिसे आप एक बार बनाकर फ्रिज में स्टोर भी कर सकते हैं।</p>
<p><strong>सामग्री-<br /></strong>कच्चे आम- 2-3 मध्यम आकार के<br />ताजा पुदीना पत्तियां- ½ कप<br />चीनी या गुड़- स्वादअनुसार<br />भुना हुआ जीरा पाउडर- 1 चम्मच<br />काला नमक- 1 चम्मच<br />सेंधा नमक या सादा नमक- स्वादानुसार<br />काली मिर्च पाउडर- ¼ चम्मच<br />ठंडा पानी- 3-4 गिलास</p>
<p><strong>बनाने की विधि-<br /></strong>सबसे पहले कच्चे आमों को धोकर कुकर में 1-2 गिलास पानी के साथ डालें। 2-3 सीटी आने तक उबालें, ताकि आम नरम हो जाएं।<br />जब आम ठंडे हो जाएं, तो उनका छिलका उतार दें और एक चम्मच की मदद से सारा गूदा एक बर्तन में निकाल लें और गुठली को अलग कर दें।<br />अब इस पल्प को एक ब्लेंडर में डालें। इसमें पुदीना पत्तियां, चीनी/गुड़, काला नमक, भुना जीरा और काली मिर्च डालें और इसे तब तक ब्लेंड करें जब तक कि एक चिकना पेस्ट न बन जाए।<br />तैयार पेस्ट को एक बड़े जग में निकालें। इसमें ठंडा पानी मिलाएं और अच्छी तरह चलाएं। अगर आपको गाढ़ा पन्ना पसंद है, तो पानी कम डालें।<br />तैयार आम पन्ना को गिलासों में डालें। ऊपर से बर्फ के टुकड़े और पुदीने की एक पत्ती से सजाकर ठंडा-ठंडा सर्व करें।</p>
</div>
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			</item>
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		<title>स्किन कैंसर का पता लगाने में डॉक्टरों का नया हथियार बनेगा AI</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/161098/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Apr 2026 06:32:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[एक नए अध्ययन में बुधवार को यह बात सामने आई, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) उन लोगों में शुरुआती खतरे के पैटर्न की पहचान कर सकता है, जिन्हें मेलानोमा होने का ज्यादा खतरा है। एआई माडल प्रारंभिक चरण के मेलेनोमा और अन्य त्वचा कैंसर का पता लगाने में ज्यादा सटीकता दिखा सकते हैं। यह अध्ययन स्वीडन की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="717" height="404" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/2-1.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/2-1.jpg 717w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/04/2-1-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 717px) 100vw, 717px"></p>
<p>एक नए अध्ययन में बुधवार को यह बात सामने आई, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) उन लोगों में शुरुआती खतरे के पैटर्न की पहचान कर सकता है, जिन्हें मेलानोमा होने का ज्यादा खतरा है। एआई माडल प्रारंभिक चरण के मेलेनोमा और अन्य त्वचा कैंसर का पता लगाने में ज्यादा सटीकता दिखा सकते हैं।</p>
<p>यह अध्ययन स्वीडन की वयस्क जनसंख्या के लिए नियमित रूप से एकत्रित रजिस्ट्री डाटा पर आधारित था । विश्लेषण किए गए डाटा में उम्र, लिंग, निदान, दवाओं का उपयोग और सामाजिक-आर्थिक स्थिति शामिल थी। इस अध्ययन में शामिल 6,036,186 व्यक्तियों में से 38,582 (0.64 प्रतिशत) लोगों को अध्ययन के पांच वर्षों के दौरान मेलेनोमा विकसित हो गया।</p>
<p>एआई न केवल संदिग्ध घावों की पहचान करता है, बल्कि यह रोगी के मेटाडेटा (उम्र, लिंग) और डर्मोस्कोपिक छवियों के संयोजन का उपयोग करके उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान कर सकता है, जिससे पांच साल में कैंसर होने का अनुमान लगाया जा सकता है।</p>
<h2 class="wp-block-heading">भविष्य में रजिस्ट्री डाटा को अधिक रणनीतिक उपयोग  </h2>
<p>गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी की साहलग्रेन्स्का एकेडमी के डाक्टोरल छात्र मार्टिन गिलस्टेड्ट ने कहा कि ” अध्ययन दिखाता है कि स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में पहले से उपलब्ध डाटा का उपयोग मेलेनोमा के उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान के लिए किया जा सकता है । हमारे परिणाम स्पष्ट संकेत देते हैं कि भविष्य में रजिस्ट्री डाटा को अधिक रणनीतिक रूप से उपयोग किया जा सकता है। गिलस्टेड सैलग्रेंस्का विश्वविद्यालय अस्पताल के त्वचाविज्ञान और वेनेरोलाजी विभाग में एक सांख्यिकीविद् हैं।</p>
<p>जब शोधकर्ताओं ने अलग-अलग एआई माडल्स की तुलना की, तो अंतर स्पष्ट हो गया। सबसे उन्नत माडल ने उन व्यक्तियों को लगभग 73 प्रतिशत मामलों में पहचानने में सक्षम था, जिन्होंने बाद में मेलेनोमा विकसित किया, जबकि उन लोगों की पहचान नहीं हो पाईं जिन्हें यह बीमारी नहीं हुई इसकी तुलना में जब केवल उम्र और लिंग का इस्तेमाल किया गया था, तब यह आंकड़ा लगभग 64 प्रतिशत था।</p>
<h2 class="wp-block-heading">पांच साल में मेलानोमा होने का जोखिम लगभग 33 प्रतिशत </h2>
<p>जांच-पड़ताल, दवाओं और सामाजिक-जनसांख्यिकीय डाटा के मेल से ऐसे छोटे ज्यादा जोखिम वाले समूहों की पहचान करना मुमकिन हो पाया, जिनके लिए पांच साल में मेलानोमा होने का जोखिम लगभग 33 प्रतिशत था।</p>
<p>गोथेनबर्ग यूनिवर्सिटी में डर्मेटोलाजी और वेनेरोलाजी के एसोसिएट प्रोफेसर सैम पोलेसी ने कहा कि हमारे विश्लेषण बताते हैं कि छोटे ज्यादा जोखिम वाले समूहों की चुनिंदा स्क्रीनिंग से ज्यादा सटीक निगरानी और स्वास्थ्य संसाधनों का ज्यादा असरदार इस्तेमाल, दोनों हो सकते हैं। इसमें आबादी के डाटा को ‘प्रिसिजन मेडिसिन’ में शामिल करना और क्लिनिकल जांचों को और बेहतर बनाना शामिल होगा।”</p>
<p>इस तरीके को स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में लागू करने से पहले और अधिक शोध और नीतिगत निर्णयों की आवश्यकता है। हालांकि, परिणामों से यह पता चलता है कि बड़ी मात्रा में रजिस्ट्री डाटा पर प्रशिक्षित एआई माडल, मेलानोमा के लिए अधिक व्यक्तिगत जोखिम आकलन और भविष्य की स्क्रीनिंग रणनीतियों के लिए सहायता का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। एआई उपकरणों का उपयोग त्वचा विशेषज्ञ द्वारा किए जाने वाले निदान के सहायक के रूप में किया जाना चाहिए, न कि उसके विकल्प के रूप में।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सुकून भरी नींद बनी लग्जरी: सप्लीमेंट्स और स्लीप गैजेट्स पर अरबों लुटा रहे भारतीय</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/161062/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 12:32:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[आज के दौर में एक सुकून भरी नींद पाना किसी लग्जरी से कम नहीं रह गया है। एक समय था जब नींद न आना केवल एक सेहत से जुड़ी परेशानी मानी जाती थी, लेकिन अब इसी परेशानी ने भारत में एक बहुत बड़े उद्योग को जन्म दे दिया है। हमारी बदलती और भागदौड़ भरी जिंदगी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="582" height="354" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/5-10.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>आज के दौर में एक सुकून भरी नींद पाना किसी लग्जरी से कम नहीं रह गया है। एक समय था जब नींद न आना केवल एक सेहत से जुड़ी परेशानी मानी जाती थी, लेकिन अब इसी परेशानी ने भारत में एक बहुत बड़े उद्योग को जन्म दे दिया है।</p>
<p>हमारी बदलती और भागदौड़ भरी जिंदगी ने हमारी रातों की नींद छीन ली है और बदले में एक नई ‘स्लीप इकोनॉमी’ को फलने-फूलने का मौका दे दिया है। आइए, डिटेल में जानते हैं इसके बारे में।</p>
<p><strong>क्यों बन रहा है नींद का इतना बड़ा बाजार?<br /></strong>चैन से सोने की चाहत में लोग अब अपनी जेबें ढीली करने से पीछे नहीं हट रहे हैं। डिजिटल स्लीप सॉल्यूशंस, खास तरह के गद्दे, स्मार्टवॉच, डॉक्टर की फीस और स्लीप ट्रैकिंग ऐप्स की मांग तेजी से आसमान छू रही है। बाजार के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं:</p>
<p>नींद से जुड़े सप्लीमेंट्स: यह क्षेत्र सबसे तेज रफ्तार से भाग रहा है। 2024 में 1,452 करोड़ रुपये का यह बाजार 2033 तक 5,993 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।<br />स्लीप एड प्रोडक्ट्स: साल 2025 में 2,797 करोड़ रुपये का अनुमानित बाजार, 2034 तक बढ़कर 6,109 करोड़ रुपये का हो सकता है।<br />अनिद्रा का बाजार: 2024 में यह 1,435 करोड़ रुपये था और 2033 तक 1,801 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू सकता है। वहीं, इसके इलाज से जुड़ा बाजार 2030 तक 1,278 करोड़ रुपये तक जाने का अनुमान है।</p>
<p><strong>हमारी आदतें और गैजेट्स बन रहे नींद के दुश्मन<br /></strong>आंकड़े बताते हैं कि अनिद्रा देश में एक खामोश महामारी बन चुकी है, जिससे करीब 25 फीसदी भारतीय पीड़ित हैं। युवा पीढ़ी (जेन-जी और मिलेनियल्स) की हालत सबसे ज्यादा खराब है, जहां हर चौथा युवा ठीक से सो नहीं पा रहा है। शहरी क्षेत्रों का हाल यह है कि हर तीसरे व्यक्ति को लगता है कि वह अनिद्रा का शिकार है।</p>
<p>इस समस्या के पीछे सबसे बड़ा हाथ हमारी आदतों का है। करीब 87 प्रतिशत लोग बिस्तर पर जाने से पहले अपने मोबाइल फोन में लगे रहते हैं, और भारत में 60 प्रतिशत आबादी रात 11 बजे के बाद ही सोने जाती है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि अगली सुबह 48 प्रतिशत लोग सोकर उठने के बाद भी खुद को थका हुआ ही पाते हैं।</p>
<p><strong>बीमारियों को न्योता दे रही अधूरी नींद<br /></strong>नींद पूरी न होने का नुकसान केवल दिन भर की सुस्ती नहीं है। यह हमारी याददाश्त और सही फैसले लेने की दिमागी क्षमता को सीधे तौर पर कमजोर करती है। लंबे समय तक नींद की कमी रहने से इम्युनिटी घटती है और मोटापा, डिप्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। महिलाओं के मामले में यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, क्योंकि उन्हें घर-दफ्तर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ हार्मोनल बदलावों का भी सामना करना पड़ता है।</p>
<p><strong>गैजेट्स नहीं, लाइफस्टाइल है असली इलाज<br /></strong>भले ही बाजार आपको अच्छी नींद के लिए रोज नए गैजेट्स और दवाएं बेच रहा हो, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का स्पष्ट रूप से मानना है कि यह सब केवल कुछ समय की राहत दे सकते हैं। असली और पक्का समाधान हमारी दिनचर्या सुधारने में है। एक तय समय पर सोने की आदत डालना, सोने से पहले मोबाइल और लैपटॉप से दूरी बनाना और खुद को स्ट्रेस-फ्री रखना बेहद जरूरी है।</p>
<p>राहत की बात यह है कि अब कॉर्पोरेट जगत भी इस खतरे को भांप रहा है। कई कंपनियां अब अपने कर्मचारियों की मेंटल हेल्थ को तवज्जो दे रही हैं और उन्हें फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स वेलनेस प्रोग्राम जैसी सुविधाएं मुहैया करा रही हैं। कुल मिलाकर, नींद कोई प्रोडक्ट नहीं है जिसे खरीदा जा सके, बल्कि यह एक हेल्दी लाइफस्टाइल का ही इनाम है।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>सिर्फ फेफड़े ही नहीं, शरीर के इन अंगों को भी खोखला करता है सिगरेट का धुआं</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/160997/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Apr 2026 06:32:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[जब कोई व्यक्ति सिगरेट पीता है, तो वह अनजाने में अपनी ही सांसों के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर लेता है। जी हां, अक्सर लोग तनाव से बचने के लिए सिगरेट का सहारा लेते हैं, लेकिन हकीकत में यह किसी समस्या का हल नहीं, बल्कि हकीकत से भागने का एक तरीका है। एक छोटी-सी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="712" height="406" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/56-7.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async"></p>
<p>जब कोई व्यक्ति सिगरेट पीता है, तो वह अनजाने में अपनी ही सांसों के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर लेता है। जी हां, अक्सर लोग तनाव से बचने के लिए सिगरेट का सहारा लेते हैं, लेकिन हकीकत में यह किसी समस्या का हल नहीं, बल्कि हकीकत से भागने का एक तरीका है। एक छोटी-सी खांसी से शुरू होने वाली यह लत धीरे-धीरे सांस फूलने और सीढ़ियां चढ़ने तक में परेशानी का कारण बन जाती है।</p>
<p><strong>खून में घुलता 7,000 केमिकल्स का जहर<br /></strong>क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि तंबाकू के धुएं में 7,000 से भी ज्यादा खतरनाक केमिकल्स होते हैं? डॉक्टर के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति सिगरेट का कश लगाता है, तो ये सारे रसायन सीधे खून में अवशोषित हो जाते हैं और शरीर के कोने-कोने तक पहुंच जाते हैं।</p>
<p>इसके कारण शरीर के डीएनए को भारी नुकसान पहुंचता है और शरीर में अंदरूनी सूजन और ‘ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस’ बढ़ जाता है। यही वजह है कि धूम्रपान का असर शरीर के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं रहता।</p>
<p><strong>शरीर के हर अंग पर होता है सीधा अटैक<br /></strong>कैलाश दीपक हॉस्पिटल के जाने-माने पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. सुशील कुमार उपाध्याय और डॉ. रितीशा भट्ट चेतावनी देते हैं कि धूम्रपान सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि सिर से लेकर पैर तक शरीर के हर अंग को खोखला कर देता है:</p>
<p>फेफड़े और कैंसर का खतरा: लंबे समय तक सिगरेट पीने से क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, एम्फिसेमा और सीओपीडी जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं। इसके अलावा, यह केवल फेफड़ों के कैंसर का ही नहीं, बल्कि मुंह, गले और यूरिनरी ब्लैडर के कैंसर का भी एक बहुत बड़ा कारण है।<br />दिल और दिमाग की नसें: एक अकेली सिगरेट दिल की धड़कन की लय को बिगाड़ सकती है। यह नसों को सिकोड़ कर ब्लड प्रेशर बढ़ाती है, जिससे नसों में खून के थक्के जमने लगते हैं। नतीजतन, हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।<br />डायबिटीज पर असर: अगर किसी व्यक्ति को हाई ब्लड शुगर की समस्या है और वह सिगरेट भी पीता है, तो उसकी यह बीमारी पूरी तरह बेकाबू हो सकती है।<br />इनफर्टिलिटी की समस्या: पुरुषों में धूम्रपान के कारण कमजोरी और इनफर्टिलिटी की समस्या आ सकती है। वहीं, महिलाओं में इसके कारण गर्भावस्था के दौरान गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं, जिसका सीधा और खतरनाक असर उनके नवजात शिशु पर पड़ता है।</p>
<p><strong>परिवार के लिए जानलेवा है आपकी लत<br /></strong>इस बुरी आदत का सबसे दुखद पहलू यह है कि धूम्रपान करने वाला व्यक्ति सिर्फ अपनी जान ही जोखिम में नहीं डालता, बल्कि अपने निर्दोष परिवार को भी नुकसान पहुंचाता है। घर के मासूम बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता आपके द्वारा छोड़े गए धुएं को अपनी सांसों के जरिए अंदर लेने के लिए मजबूर होते हैं। इसे ‘पैसिव स्मोकिंग’ या ‘सेकंड-हैंड स्मोक’ कहा जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए उतना ही खतरनाक है।</p>
<p>विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि हर साल दुनिया भर में लाखों लोग धूम्रपान से जुड़ी बीमारियों की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं। याद रखिए, मरने वाले ये लोग सिर्फ कोई आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि वे किसी के पिता, किसी की मां, किसी के भाई या किसी की बेटी हैं।</p>
<p><strong>असली ताकत सिगरेट छोड़ने में है<br /></strong>डॉक्टर्स का साफ कहना है कि असली ताकत सिगरेट को उंगलियों के बीच दबाने में नहीं है, बल्कि इस लत को हमेशा के लिए अपनी जिंदगी से निकाल फेंकने में है। अगर हम इस आदत को छोड़ दें, तो हमारा समाज और हमारा देश कहीं ज्यादा सुरक्षित हो जाएगा।</p>
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		<title>रोज की छोटी-मोटी बातें भूलना भी हो सकता है डायबिटीज का संकेत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 06:34:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[आज के समय में डायबिटीज एक ऐसी बीमारी बन चुकी है जो हर उम्र के व्यक्ति को अपनी चपेट में ले रही है। जब भी हम डायबिटीज की बात करते हैं, तो अक्सर लोगों के दिमाग में ज्यादा प्यास लगना या बार-बार टॉयलेट जाना जैसे लक्षण ही आते हैं। हालांकि, बार-बार प्यास लगना इसका एक &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img width="768" height="403" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/4-1.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy"></p>
<p>आज के समय में डायबिटीज एक ऐसी बीमारी बन चुकी है जो हर उम्र के व्यक्ति को अपनी चपेट में ले रही है। जब भी हम डायबिटीज की बात करते हैं, तो अक्सर लोगों के दिमाग में ज्यादा प्यास लगना या बार-बार टॉयलेट जाना जैसे लक्षण ही आते हैं।</p>
<p>हालांकि, बार-बार प्यास लगना इसका एक मुख्य संकेत है, लेकिन इसके और भी कई ऐसे संकेत होते हैं, जिन्हें अक्सर छोटी-मोटी समस्या समझकर लोग टाल देते हैं। डायबिटीज के कारण आपके दिमाग पर भी असर होता है, जिस तरफ लोग कम ध्यान देते हैं। आइए जानें इन संकेतों के बारे में।</p>
<p><strong>दिमाग की काम करने की क्षमता पर असर<br /></strong>खून में शुगर का स्तर सामान्य से कम या ज्यादा होना सीधे आपके दिमाग को प्रभावित कर सकता है। जिस तरह डायबिटीज शरीर के अन्य हिस्सों की नसों को नुकसान पहुंचाती है, ठीक उसी तरह यह दिमाग की नसों को भी डैमेज कर सकती है।</p>
<p>अक्सर लोग इसे काम का तनाव या बढ़ती उम्र मान लेते हैं, लेकिन चीजों को भूलना या फोकस में कमी आना डायबिटीज का शुरुआती संकेत हो सकता है। साथ ही, नई बातों को समझने या मुश्किल समस्याओं को सुलझाने में आने वाली परेशानी दिमाग की नसों पर पड़ रहे प्रभाव का नतीज हो सकती है।</p>
<p><strong>पैरों और हाथों में अजीब झनझनाहट<br /></strong>पैरों में होने वाली हल्की जलन या झनझनाहट को अक्सर थकान या गलत जूते पहनने का कारण मान लिया जाता है। हालांकि, यह डायबिटिक न्यूरोपैथी का शुरुआती संकेत हो सकता है। हाथों या पैरों में सुई चुभने जैसा महसूस होना, सुन्नपन या अचानक होने वाला दर्द व पैरों के तलवों में जलन होना इसके संकेत हैं। ये लक्षण बताते हैं कि हाई ब्लड शुगर आपकी नसों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर चुका है।</p>
<p><strong>आंखों में धुंधलापन<br /></strong>अगर आपको अचानक सब कुछ धुंधला दिखाई देने लगे, तो इसे सिर्फ चश्मे का नंबर बढ़ने से न जोड़ें। ब्लड में शुगर ज्यादा होने से आंखों के लेंस में सूजन पैदा कर सकती है, जिससे धुंधला दिखाई देने की समस्या हो जाती है। समय पर इलाज न मिलने पर यह रेटिना को नुकसान पहुंचा सकता है।</p>
<p><strong>घाव भरने में देरी और बहुत थकान<br /></strong>हाई शुगर लेवल शरीर की इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता और सेल रिपेयर को धीमा कर देता है। इसके साथ ही, दिन भर भरपूर मात्रा में खाने और सोने के बाद भी बहुत थकान महसूस होना इस बात का संकेत है कि आपका शरीर शुगर का सही ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है।</p>
<p><strong>डायबिटीज के दूसरे सामान्य लक्षण<br /></strong>खाना खाने के बावजूद बार-बार भूख लगना।<br />बार-बार यूरिन आना, खासकर रात के समय बार-बार उठना।<br />बिना किसी कोशिश के वजन का तेजी से गिरना।</p>
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		<title>सिर्फ आंखों की रोशनी ही नहीं, जानलेवा कैंसर के खिलाफ भी ढाल बनेगा ये ‘खास’ न्यूट्रिएंट</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/160966/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 06:34:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[हम सभी जानते हैं कि हेल्दी डाइट और कुछ खास पोषक तत्व हमारी आंखों की रोशनी के लिए वरदान होते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख कैरोटीनॉयड है- ‘जेक्सैंथिन’, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके बारे में एक बेहद ही चौंकाने वाला खुलासा किया है। दरअसल, आंखों की सेहत को बढ़ावा देने वाला यह तत्व अब &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="923" height="523" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg 923w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/04/7-768x435.jpg 768w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/04/7-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 923px) 100vw, 923px"></p>
<p>हम सभी जानते हैं कि हेल्दी डाइट और कुछ खास पोषक तत्व हमारी आंखों की रोशनी के लिए वरदान होते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख कैरोटीनॉयड है- ‘जेक्सैंथिन’, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके बारे में एक बेहद ही चौंकाने वाला खुलासा किया है।</p>
<p>दरअसल, आंखों की सेहत को बढ़ावा देने वाला यह तत्व अब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ने में भी एक मजबूत ढाल साबित हो सकता है।</p>
<p><strong>कैंसर सेल्स को ढूंढकर मारेगी आपकी इम्युनिटी<br /></strong>यह नई और अहम जानकारी शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में सामने आई है। इस महत्वपूर्ण रिसर्च के नतीजे मेडिकल जर्नल ‘सेल रिपोर्ट्स मेडिसिन’ में प्रकाशित किए गए हैं। इस अध्ययन ने चिकित्सा जगत को एक नई उम्मीद दी है कि कैसे एक सामान्य सा तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कैंसर को हराने में मदद कर सकता है।</p>
<p><strong>‘एंटी-ट्यूमर’ इम्युनिटी को लेकर हुआ खुलासा<br /></strong>इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जिंग चेन ने भी इन नतीजों पर खुशी और हैरानी जताई है। उनका कहना है, “हमें यह जानकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि जेक्सैंथिन, जिसे हम अब तक मुख्य रूप से आंखों के स्वास्थ्य में इसकी बेहतरीन भूमिका के लिए ही जानते थे, वह असल में शरीर के अंदर एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा को बढ़ाने का भी काम करता है।”</p>
<p><strong>कैंसर के खिलाफ कैसे काम करता है यह तत्व?<br /></strong>शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि जेक्सैंथिन हमारे शरीर की खास रक्षक कोशिकाओं- ‘सीडी8 प्लस टी कोशिकाओं’ की काम करने की क्षमता को सीधे तौर पर तेज कर देता है। आपको बता दें कि ये खास प्रतिरक्षा कोशिकाएं ही शरीर में मौजूद कैंसर की खतरनाक कोशिकाओं की पहचान करने और उन्हें नष्ट करने की सबसे अहम जिम्मेदारी निभाती हैं।</p>
<p>अध्ययन में इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया गया है। दरअसल, असामान्य या कैंसर वाली कोशिकाओं का पता लगाने के लिए ये ‘सीडी8 प्लस टी कोशिकाएं’ एक विशेष संरचना पर निर्भर करती हैं, जिसे ‘टी-कोशिका रिसेप्टर’ कहा जाता है।</p>
<p><strong>टी-सेल्स का ‘रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स’ होगा मजबूत<br /></strong>वैज्ञानिकों ने पाया कि जब ये रक्षक टी-कोशिकाएं कैंसर की कोशिकाओं से टकराती हैं, तो जेक्सैंथिन वहां पहुंचकर इस ‘रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स’ के निर्माण को मजबूत और स्थिर करने में मदद करता है। इस मजबूती के कारण कोशिकाओं के अंदर के संकेत काफी तेज हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि टी-कोशिकाएं पहले से ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, साइटोकाइन का उत्पादन बढ़ जाता है और कुल मिलाकर ट्यूमर को नष्ट करने की कोशिकाओं की ताकत में भारी सुधार होता है।</p>
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		<title>बच्चों और बड़ों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है टीबी की नई वैक्सीन</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/160952/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 06:32:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[भारत में टीबी जैसी गंभीर बीमारी को हराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में दो नई टीबी वैक्सीन- वीपीएम 1002 (VPM1002) और इम्यूवैक (IMMUVAC) का एक बड़ा परीक्षण किया गया है। ‘द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल’ में प्रकाशित इस फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे बताते हैं कि ये दोनों वैक्सीन बच्चों &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="939" height="522" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/67-7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/67-7.jpg 939w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/04/67-7-768x427.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 939px) 100vw, 939px"></p>
<p>भारत में टीबी जैसी गंभीर बीमारी को हराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में दो नई टीबी वैक्सीन- वीपीएम 1002 (VPM1002) और इम्यूवैक (IMMUVAC) का एक बड़ा परीक्षण किया गया है।</p>
<p>‘द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल’ में प्रकाशित इस फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे बताते हैं कि ये दोनों वैक्सीन बच्चों और वयस्कों के लिए सुरक्षित तो हैं, लेकिन ये टीबी के हर रूप से पूरी तरह सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकतीं।</p>
<p><strong>क्या है ‘प्रीवेनटीबी’ परीक्षण?<br /></strong>यह परीक्षण दिल्ली स्थित भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के शोधकर्ताओं द्वारा टीबी के मामलों को कम करने के उद्देश्य से किया गया है।</p>
<p>जुलाई 2019 से दिसंबर 2020 के बीच दिल्ली, महाराष्ट्र और तमिलनाडु सहित 6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 18 अलग-अलग स्थानों पर यह ट्रायल हुआ।<br />इस ट्रायल में टीबी रोगियों के घरों में रहने वाले 12,700 से अधिक ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनकी उम्र 6 वर्ष या उससे अधिक थी।<br />लोगों को रैंडम तरीके से वीपीएम 1002, इम्यूवैक या एक प्लेसबो (हर समूह में 4,239 लोग) की खुराक दी गई। एक महीने बाद 11,829 लोगों को दूसरी खुराक दी गई और लगभग 38 महीनों तक इनकी निगरानी की गई। कुल 96.7 प्रतिशत (12,295) लोगों ने परीक्षण पूरा किया।</p>
<p><strong>नई वैक्सीन की जरूरत क्यों पड़ी?<br /></strong>वर्तमान में भारत में नवजात शिशुओं को जन्म के समय टीबी से बचाने के लिए बीसीजी (BCG) का टीका लगाया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह टीका छोटे बच्चों को गंभीर प्रकार की टीबी से तो बचाता है, लेकिन यह किशोरों और वयस्कों के लिए ज्यादा प्रभावी नहीं है। इसी कमी को दूर करने के लिए नई वैक्सीन जांची जा रही हैं।</p>
<p><strong>नई वैक्सीन के बारे में खास बातें<br /></strong>वीपीएम 1002 (VPM1002): यह आनुवंशिक इंजीनियरिंग (जेनेटिक इंजीनियरिंग) का उपयोग करके बनाई गई एक पुनःसंयोजित वैक्सीन है। इसे जर्मनी की फार्मास्यूटिकल कंपनी ‘सेरम लाइफ साइंस यूरोप जीएमबीएच’ द्वारा विकसित किया गया है।<br />इम्यूवैक (IMMUVAC): यह एक निष्क्रिय वैक्सीन है जिसे बीमारी फैलाने वाले रोगजनक के गैर-संक्रामक रूप से बनाया गया है। इसे ICMR और अहमदाबाद की ‘कैडिला फार्मास्यूटिकल्स’ ने मिलकर तैयार किया है।</p>
<p><strong>क्या रहे ट्रायल के अंतिम नतीजे?<br /></strong>यह फेज-3 ट्रायल किसी भी नए इलाज की सुरक्षा और प्रभावशीलता को मापने का अंतिम चरण होता है। इसके नतीजे मिले-जुले रहे हैं:</p>
<p>सुरक्षा और प्रतिरक्षा: दोनों ही वैक्सीन वयस्कों और बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित पाई गईं और इन्होंने शरीर में एक अच्छी इम्यून प्रतिक्रिया भी पैदा की।<br />कहां मिली निराशा: परीक्षण में पाया गया कि ये दोनों वैक्सीन फेफड़ों की टीबी या टीबी के सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले सभी प्रकार के संक्रमण को पूरी तरह रोकने में सफल नहीं हो पाईं।</p>
<p><strong>कहां मिली बड़ी सफलता?<br /></strong>फेफड़ों के बाहर शरीर के अन्य अंगों में होने वाली टीबी को ‘एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी’ कहते हैं, जिसमें मृत्यु का खतरा फेफड़ों की टीबी से भी ज्यादा होता है।</p>
<p>इस वैक्सीन ने 36 से 60 वर्ष तक के वयस्कों सहित सभी आयु वर्गों में एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी के खिलाफ 50.4 प्रतिशत असर दिखाया। इसके अलावा, 6 से 14 साल के बच्चों में इसने हर तरह की टीबी (फेफड़ों की और एक्स्ट्रापल्मोनरी) से बचाव किया।<br />इस वैक्सीन ने केवल 6 से 10 साल के बच्चों में एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की।</p>
<p>भले ही ये नई वैक्सीन टीबी के हर रूप को रोकने में 100% कारगर न हों, लेकिन ‘वीपीएम 1002’ द्वारा एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (उच्च मृत्यु दर वाली टीबी) के खिलाफ दिखाया गया 50.4% का बचाव सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और संभावित लाभकारी कदम माना जा रहा है।</p>
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		<item>
		<title>हाई BP के मरीजों के लिए कौन-सी सब्जी, फल और आटा है सबसे बेस्ट? </title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/160921/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 06:32:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[जब बात हाई बीपी को कंट्रोल करने की आती है, तो दवाइयों के साथ-साथ हमारी डाइट का सही होना बहुत जरूरी है। अगर आप भी हाई बीपी की समस्या से परेशान हैं, तो यह आर्टिकल खास आपके लिए ही है। जानी-मानी डायटिशियन सोनिया नारंग ने कुछ ऐसे खास फूड्स के बारे में बताया है, जो &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img width="589" height="385" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/65-1.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy"></p>
<p>जब बात हाई बीपी को कंट्रोल करने की आती है, तो दवाइयों के साथ-साथ हमारी डाइट का सही होना बहुत जरूरी है। अगर आप भी हाई बीपी की समस्या से परेशान हैं, तो यह आर्टिकल खास आपके लिए ही है।</p>
<p>जानी-मानी डायटिशियन सोनिया नारंग ने कुछ ऐसे खास फूड्स के बारे में बताया है, जो आपके ब्लड प्रेशर को नेचुरली कंट्रोल रखने में मदद कर सकते हैं। आइए जानते हैं सब्जी से लेकर फ्रूट्स और नट्स तक, आखिर क्या हैं वो ‘सुपरफूड्स’ जिन्हें आपको अपनी थाली का हिस्सा जरूर बनाना चाहिए।</p>
<p><strong>करेला<br /></strong>अक्सर कड़वे स्वाद के कारण लोग करेले से दूर भागते हैं, लेकिन यह सब्जी हाई बीपी के मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। करेले में मौजूद खास पोषक तत्व न सिर्फ ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखते हैं, बल्कि ये आपके ब्लड शुगर को भी संतुलित करने में मदद करते हैं।</p>
<p><strong>अमरूद</strong><br />डायटिशियन के मुताबिक, फलों में अमरूद हाई बीपी के लिए एक बेहतरीन ऑप्शन है। अमरूद में भरपूर मात्रा में फाइबर, पोटैशियम और विटामिन सी होता है। पोटैशियम हमारे शरीर में सोडियम के बुरे असर को कम करता है, जिससे ब्लड प्रेशर सामान्य बना रहता है और दिल तंदुरुस्त रहता है।</p>
<p><strong>जौ का आटा<br /></strong>हम रोजाना गेहूं के आटे की रोटियां खाते हैं, लेकिन अगर आपको हाई बीपी है, तो अपनी डाइट में ‘जौ के आटे’ को शामिल करें। जौ का आटा फाइबर से भरपूर होता है, जो वजन को कंट्रोल में रखने के साथ-साथ आपकी ब्लड वेसल्स को भी हेल्दी रखता है।</p>
<p><strong>अलसी के बीज<br /></strong>अलसी के छोटे-छोटे बीजों में सेहत का बड़ा खजाना छिपा है। इनमें ओमेगा-3 फैटी एसिड और फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। रोजाना एक चम्मच भुने हुए अलसी के बीज खाने से नसों में खून का बहाव बेहतर होता है और बीपी कंट्रोल में रहता है।</p>
<p><strong>बादाम<br /></strong>बादाम सिर्फ दिमाग ही तेज नहीं करता, बल्कि आपके दिल का भी ख्याल रखता है। इसमें हेल्दी फैट्स और मैग्नीशियम होता है, जो ब्लड प्रेशर को कम करने में बहुत असरदार साबित होता है। रात में भीगे हुए 4-5 बादाम सुबह छीलकर खाना सबसे अच्छा तरीका है।</p>
<p><strong>डायटिशियन की एक खास सलाह<br /></strong>इन सभी चीजों के अलावा, डायटिशियन सोनिया नारंग एक और जादुई नुस्खा बताती हैं- मेथी दाने का पानी। रात को एक गिलास पानी में आधा चम्मच मेथी दाना भिगो दें और सुबह खाली पेट उस पानी को पी लें। यह छोटा-सा काम आपके बीपी और शुगर दोनों को बेहतर तरीके से कंट्रोल करने में मदद करेगा।</p>
</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>हार्ट अटैक के बाद अब उम्र भर ‘बीटा-ब्लॉकर्स’ की जरूरत नहीं</title>
		<link>https://fastballfiles.com/NewsArticle/160923/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Fastball Files]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 06:32:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सेहत]]></category>
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					<description><![CDATA[दक्षिण कोरिया में हुए एक क्लीनिकल ट्रायल में यह बात सामने आई है कि जो मरीज हार्ट अटैक से उबर चुके हैं और जिनकी स्थिति स्थिर व कम जोखिम वाली है, उन्हें अब जीवन भर ‘बीटा-ब्लॉकर्स’ दवाएं लेने की जरूरत नहीं है। ऐसे मरीज एक वर्ष के बाद इन दवाओं का सेवन बंद कर सकते &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div><img loading="lazy" width="903" height="523" src="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/6-6.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://fastballfiles.com/wp-content/uploads/2026/04/6-6.jpg 903w, https://amarrashtra.com/wp-content/uploads/2026/04/6-6-768x445.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 903px) 100vw, 903px"></p>
<p>दक्षिण कोरिया में हुए एक क्लीनिकल ट्रायल में यह बात सामने आई है कि जो मरीज हार्ट अटैक से उबर चुके हैं और जिनकी स्थिति स्थिर व कम जोखिम वाली है, उन्हें अब जीवन भर ‘बीटा-ब्लॉकर्स’ दवाएं लेने की जरूरत नहीं है। ऐसे मरीज एक वर्ष के बाद इन दवाओं का सेवन बंद कर सकते हैं।</p>
<p><strong>कैसे हुआ यह अध्ययन?<br /></strong>न्यू ऑरलियंस में ‘अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी’ के विज्ञानियों की बैठक में इस अहम रिसर्च के नतीजे पेश किए गए। इसके अलावा, इस अध्ययन को प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन’ में भी प्रकाशित किया गया है।</p>
<p>शोधकर्ताओं ने इस ट्रायल में कुल 2,540 ऐसे मरीजों को शामिल किया, जो पहले हार्ट अटैक का शिकार हो चुके थे और जिन्हें इलाज के तौर पर मेटोप्रोलोल और एटेनोलोल जैसी बीटा-ब्लॉकर्स दवाएं दी जा रही थीं।</p>
<p><strong>रिसर्च के चौंकाने वाले आंकड़े<br /></strong>शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन मरीजों ने 12 महीने के बाद बीटा-ब्लॉकर्स दवाएं लेना बंद कर दिया, उनकी स्थिति बिल्कुल उन मरीजों के समान ही थी जिन्होंने इन दवाओं का सेवन आगे भी जारी रखा था। औसतन 3.5 वर्षों तक इन मरीजों के स्वास्थ्य पर नजर रखी गई।</p>
<p>नतीजों में देखा गया कि दवा बंद करने वाले केवल 7.2 प्रतिशत मरीजों में दिल से जुड़ी गंभीर या प्रतिकूल घटनाएं (जैसे मृत्यु, दोबारा हार्ट अटैक या हार्ट फेल होने पर अस्पताल में भर्ती होना) घटीं। वहीं, इसके विपरीत, दवा जारी रखने वाले 9 प्रतिशत मरीजों को ऐसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा।</p>
<p><strong>क्या करती हैं बीटा-ब्लॉकर्स दवाएं?<br /></strong>बीटा-ब्लॉकर्स मुख्य रूप से वे दवाएं हैं जो मरीज के हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर को कम करने का काम करती हैं। हार्ट अटैक के बाद दिल को सुरक्षित रखने और भविष्य में होने वाली हृदय संबंधी समस्याओं को रोकने के लिए, लंबे समय से इन दवाओं को उपचार का सबसे प्रमुख आधार माना जाता रहा है।</p>
<p>इस नई रिसर्च ने स्पष्ट कर दिया है कि कम जोखिम वाले मरीजों को इन दवाओं पर जीवन भर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है, जो कि हार्ट अटैक से उबर रहे लोगों के लिए बेहद सुकून भरी बात है।</p>
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