होर्मुज में ट्रंप की नाकेबंदी, भारत के 15 जहाज फंसे
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर पूर्ण नाकेबंदी की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों ने जलडमरूमध्य के बाहर तैनाती कर दी है, जबकि अमेरिकी वायु सेना अपनी अत्याधुनिक निगरानी प्रणालियों के साथ पूरे मार्ग को सील करने की कोशिश में जुटी हुई है।
हालांकि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों से आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया है लेकिन क्षेत्र में स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। एक बड़ा कारण समुद्र में ईरान की ओर से लगाए गए बारूद भी हैं। भारत स्थिति को देखकर आगे की राह तय करेगा।
होर्मुज में भारत के जो 15 जहाज फंसे
भारत का शुरुआती आकलन है कि अगर अमेरिकी प्रतिबंध प्रभावी ढंग से लागू होते हैं तो यह उसके लिए फायदेमंद साबित होगा, क्योंकि नाकेबंदी केवल ईरानी बंदरगाहों से आने वाले जहाजों तक सीमित है। जबकि ईरान के साथ भारत का कारोबार बहुत सीमित है। होर्मुज में भारत के जो 15 जहाज फंसे हैं वो सभी गैर-ईरानी बंदरगाहों से तेल, गैस ले कर आ रहे हैं।
बहरहाल, इस नाकेबंदी के चलते ईरान के प्रमुख बंदरगाहों, जैसे बंदर अब्बास (सबसे बड़ा कंटेनर और बहुउद्देशीय बंदरगाह), खार्ग द्वीप (ईरान का प्राथमिक तेल निर्यात टर्मिनल, जहां से 90 फीसद कच्चा तेल निकलता है), असलूयेह (गैस और पेट्रोकेमिकल निर्यात का केंद्र), बंदर इमाम खुमैनी, बंदर-ए-महशहर और बंदर-ए-बुशहर से आने वाले सभी जहाजों पर रोक लग जाएगी।
वहीं, गैर-ईरानी बंदरगाहों जैसे संयुक्त अरब अमीरात के फुजैरा (भारत के लिए जरूरी), जेबेल अली और खलीफा पोर्ट, सऊदी अरब के रास तनुरा, कतर, कुवैत और इराक के कुछ टर्मिनल्स से तेल-गैस ले कर आने वाले जहाजों को अमेरिका सक्रिय मदद और सुरक्षा प्रदान करेगा। भारत के कुल तेल आयात का 40 से 55 फीसद इन्हीं गैर-ईरानी बंदरगाहों से आता है।
अमेरिकी नाकेबंदी पर स्थिति साफ होने का इंतजार
भारत के विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि, “सरकार होर्मुज क्षेत्र में अमेरिकी नाकेबंदी पर स्थिति साफ होने का इंतजार कर रही है। अमेरिका ने बाहर अपने नौसेना जहाजों को तैनात कर दिया है, लेकिन इससे जहाजों को सुरक्षित निकालने की कोई गारंटी नहीं है, खास तौर पर समुद्र में बिछाए गए बारूदी सुरंगों की वजह से।”
“ये सुरंगे ईरान ने बिछाई हैं और अभी तक जो जहाज वहां से निकल रहे थे, उन्हें ईरानी सेना के नेतृत्व में ही निकाला जा रहा था। ऐसे में होर्मुज से जहाजों को निकालने की क्या व्यवस्था हो रही है, इसकी स्थिति अगले 24 से 48 घंटों में साफ होने की उम्मीद है। अगर अमेरिका की पहल कामयाब होती है और वह होर्मुज से गैर-ईरानी बंदरगाहों से निकलने वाले जहाजों को सुरक्षा देता है तो ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भारत को बड़ी राहत होगी।”
ईरान पर 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन बुरी तरह प्रभावित हो गई है। यह मार्ग भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। विश्व की करीब 20 फीसद कच्चे तेल की आपूर्ति इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरती है, जिसमें भारत का बड़ा हिस्सा शामिल है।
होर्मुज भारत के लिए सबसे तेज और सस्ता विकल्प
पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा का कहना है कि, “भारत पहले खाड़ी देशों से 60 फीसदी तेल खरीदता था, लेकिन अब विविधीकरण की नीति के तहत यह हिस्सा घटकर सिर्फ 30 फीसदी रह गया है।
करीब 70 फीसदी तेल अब रूस, अमेरिका, मैक्सिको, नाइजीरिया और गुयाना जैसे दूर-दराज के देशों से आ रहा है।” यह बदलाव पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद दिखा है। फिर भी, खाड़ी क्षेत्र से आने वाला तेल भारत के लिए सबसे तेज और सस्ता विकल्प है।
स्टैंडर्ड एंड पुअर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका से जहाज भारत पहुंचने में तीन से चार हफ्ते, रूस से तीन हफ्ते और नाइजीरिया से कम से कम दो हफ्ते लगते हैं। वहीं, खाड़ी क्षेत्र से मात्र चार से सात दिनों में जहाज भारतीय तट पर पहुंच जाते हैं। वर्तमान में होर्मुज क्षेत्र में भारत के 15 जहाज फंसे हुए हैं, जो अन्य बंदरगाहों से तेल, गैस और अन्य सामान ले कर आ रहे हैं। युद्ध की शुरुआत के समय वहां 24 जहाज थे।
भारत ने 9 जहाजों को बाहर निकाला
भारत सरकार ने ईरान से बात करके 9 जहाजों को बाहर निकाला है। लेकिन पश्चिम एशिया के हालात नहीं सुधरे तो यह भारत की पूरी तेल इकोनॉमी पर दूरगामी असर डालेगा। खाड़ी देशों के मुकाबले अमेरिका, रूस, दक्षिण अमेरिकी देशों या अफ्रीका से तेल, गैस लाना महंगा सौदा है। इसका असर पूरे देश की इकोनॉमी पर होगा।
सरकार पहले से ही रूस और अन्य स्त्रोतों से आयात बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है, लेकिन होर्मुज जैसे चोकपॉइंट पर किसी भी अस्थिरता से ऊर्जा सुरक्षा को चुनौती मिलती है।
विदेश मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, भारत स्थिति पर नजर रखते हुए वैकल्पिक मार्गों और आपूर्ति स्त्रोतों को और मजबूत करने की तैयारी में है। फिलहाल, 24-48 घंटों में स्पष्टता आने की उम्मीद है, जिससे न केवल फंसे जहाजों की सुरक्षा बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा आपूर्ति भी सुनिश्चित हो सकेगी।




