कड़ाके की ठंड और प्रदूषण बढ़ा सकते हैं प्रीमैच्योर डिलीवरी का खतरा
अत्यधिक सर्दी और प्रदूषण के संपर्क में आने से समय से पहले जन्म का खतरा बढ़ जाता है और गर्भवती महिलाओं में ब्लडप्रेशर बढ़ सकता है, जो बच्चे की वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। इस बारे में डाक्टरों ने चेतावनी दी है। सिताराम भार्तिया इंस्टीट्यूट आफ साइंस एंड रिसर्च की वरिष्ठ सलाहकार और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनीता सबेरवाल ने कहा कि सर्दियों में प्यास की कमी के कारण पानी का सेवन कम होता है। ठंडे मौसम और भारी कपड़ों के कारण आलस्य बढ़ता है और व्यायाम के लिए प्रेरणा की कमी होती है। इससे थकान, जोड़ों और मांसपेशियों में जकड़न और दर्द, साथ कब्ज की समस्या होती है।
समय से पहले जन्म और छोटे बच्चों को खतरा
डॉ. सबेरवाल ने कहा कि सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने के साथ – साथ सांस लेने में कठिनाई और ब्रोंकाइटिस के मामले बढ़ जाते हैं। सर्दी में पारंपरिक मिठाइयों, मेवों व घी का सेवन बढ़ता है, जो वजन बढ़ाने और शुगर के स्तर में वृद्धि का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि परिवार, प्रसूति विशेषज्ञों और स्वास्थ्य शिक्षकों के साथ मिलकर स्वस्थ पोषण बनाए रखना, हाइड्रेशन में सुधार करना और व्यायाम के तरीकों में सुधार करना महत्वपूर्ण है।
हाई ब्लड प्रेशर और प्रीएक्लेम्पसिया जैसी समस्याएं
डाक्टरों के अनुसार, मानव शरीर ठंड के प्रति प्रतिक्रिया करते हुए रक्त वाहिकाओं को संकुचित करता है, ताकि गर्मी को संरक्षित किया जा सके। हालांकि यह एक सामान्य शारीरिक प्रतिक्रिया है। गर्भावस्था पहले से ही परिसंचरण प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव डालती है। जब रक्त वाहिकाएं और अधिक संकुचित होती हैं, तो ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, जिससे गर्भावस्था से संबंधित हाई बीपी और प्रीएक्लेम्पसिया जैसी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।
गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से लेनी चाहिए धूप
डॉ. कुमारी ने कहा, यदि आपके डाक्टर द्वारा सलाह दी जाए तो मौसमी फ्लू का टीका लगवाएं, उच्च प्रदूषण या फ्लू के प्रकोप के दौरान भीड़-भाड़ वाले स्थानों से बचें और प्रदूषित या भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में मास्क पहनें । हाथों को बार-बार धोएं और बुखार, लगातार खांसी या सांस लेने में कठिनाई के लिए जल्दी डाक्टर से परामर्श करें। डॉ. कुमारी ने बताया कि भारत महिलाओं में विटामिन डी की कमी आम है, जो सर्दियों में और बढ़ जाती है। गर्भवती महिलाओं को चेहरे और हाथों पर 15 से 20 मिनट की धूप लेनी चाहिए। निर्धारित सप्लीमेंट्स लेने चाहिए और नियमित चेकअप कराना चाहिए। पता चला कि ठंड में आने से शरीर में तनाव से संबंधित हार्मोनल सिस्टम सक्रिय होते हैं, जैसे कि सहज तंत्रिका तंत्र और रेनिन एंजियोटेंसिन प्रणाली, जो बीपी को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं और भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकते हैं।
ये करने होंगे उपाय
डॉ. यशिका गुडेसर ने कहा, गर्म रहना, छह से आठ घंटे की नींद लेना, भ्रूण के वजन बढ़ाने के लिए उच्च प्रोटीन आहार का पालन करना और डाक्टर द्वारा निर्धारित रक्त पतला करने वाली दवाएं लेना इन जोखिमों को प्रबंधित करने में मदद कर सकता है। डॉ. निकिता कुमारी ने कहा कि सर्दियों में गर्भावस्था एक अनूठी चुनौती लेकर आती है। हालांकि ये समस्याएं आमतौर पर गंभीर नहीं होती हैं। उन्होंने कहा कि समय पर देखभाल और सरल सावधानियां मां और बच्चे दोनों को स्वस्थ रखने में मदद कर सकती हैं। गर्भावस्था से प्रतिरक्षा कम होती है और भारत में सर्दियों में अक्सर वायरल संक्रमण, फ्लू, खांसी, जुकाम और वायु प्रदूषण से संबंधित श्वसन समस्याओं में वृद्धि होती है।
सिरदर्द, सूजन या ब्लडप्रेशर को न करें नजरअंदाज
अध्ययनों ने दूसरे और तीसरे त्रैमासिक के दौरान लंबे समय तक ठंड के संपर्क को कम जन्म वजन वाले बच्चों के जन्म के उच्च जोखिम से जोड़ा है। प्रारंभिक गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक ठंड का समय से पूर्व जन्म के बढ़ते जोखिम से भी संबंध है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. स्वप्निल अग्रहरी ने कहा, जब प्लेसेंटा का रक्त प्रवाह कम होता है, तो बच्चे को पर्याप्त पोषण नहीं मिल सकता है, जिससे वृद्धि धीमी हो सकती है। विशेषज्ञों ने जोर दिया कि लगातार सिरदर्द, सूजन या ब्लडप्रेशर में अचानक वृद्धि जैसे लक्षणों को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉ. अग्रहरी ने कहा कि सही देखभाल, जागरूकता और समय पर चिकित्सा मार्गदर्शन के साथ अधिकांश सर्दियों से संबंधित गर्भावस्था के जोखिमों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है, जिससे मां और बच्चे दोनों की स्वास्थ्य और भलाई सुनिश्चित होती है।


